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जिनका कोई गुरु नहीं उनका जीवन शुरू नहीं: विजय कौशल महाराज

भगवान जगत गुरू हैं, मनुष्य के जीवन में किसी न किसी गुरू की आवश्यकता रहती है। मनुष्य का जीवन बिना गुरू के अधूरा माना...

Bhaskar News Network | Last Modified - Feb 01, 2018, 03:10 AM IST

भगवान जगत गुरू हैं, मनुष्य के जीवन में किसी न किसी गुरू की आवश्यकता रहती है। मनुष्य का जीवन बिना गुरू के अधूरा माना जाता है। गुरू के बिना ज्ञान नहीं मिलता और बिना ज्ञान के ईश्वर की प्राप्ति नहीं होती। जीवन रूपी पतंग की डोर गुरू के हाथ में होने से वे उसे ऊंचाई तक ले जाते हैं, जिससे अपने आप लक्ष्य मिल जाता है। लाल बहादुर स्कूल परिसर में चल रही श्री राम कथा में बुधवार को पंडित विजय कौशल महाराज ने कहा कि किसी जैन मुनि ने कहा है कि जिनका कोई गुरू नहीं उनका जीवन शुरू नहीं।

श्रीराम कथा में गुरू की महिमा बताते हुए मानस मर्मज्ञ महाराज गुरू की महिमा का वर्णन करते हुए कहा कि पतंग और पतंगा में बहुत अंतर नहीं होता, परन्तु पतंगा (कीट) वासनाओं से विकारों से भरा हुआ स्वतंत्र विचरण करते हुए दीपक की लौ में जलकर मर जाता है और पतंग की डोर दूसरे अर्थात सदगुरु के हाथ में रहने से पतंग सदैव आसमान की ऊंचाइयों को छूती है। इसलिए जीवन में गुरू की आवश्यकता होती है। 14 वर्ष का वनवास मिलने के बाद श्रीराम भारद्वाज मुनि के आश्रम पहुंचे और उनसे मार्गदर्शन लेकर आगे बढ़े। स्वामी जी ने कहा कि मनुष्य के सामने चार प्रश्न होते हैं। मै कौन हूं, इस दुनिया में क्यों आया हूं, मैं क्या कर रहा हूं, मुझे कहां जाना है। इन सबका सही ज्ञान एक अच्छा गुरू ही दे सकता है। उन्होंने कहा जो पशु स्वतंत्र होता है वह असुरक्षित व डरा हुआ भी होता है, लेकिन जो खूंटे में बंधा हुआ होता है वह सुरक्षित व निश्चिंत हो जाता है, क्योंकि उसकी हर तरह की चिंता मालिक की होती है। ठीक उसी तरह मनुष्य को भी सद्गुरु के ज्ञान रूपी खूंटे से बंधकर रहना चाहिए। फिर आगे की चिंता गुरू की होती है। स्वामी जी ने कहा कि जिनके पास बैठ कर मन शांत और शीतल हो जाए उन्हीं के चरण पकड़ लीजिए। इसके बाद भगवान वाल्मीकि के आश्रम पहुंचे। वाल्मीकि को पता चला राघवेंद्र सरकार पधारे हैं तो वह खुशी से नाचने लगे। भगवान ने कहा छोटी कुटिया बनाने की जगह दीजिए। भगवान ने कहा केवल जगह दीजिए, लखन और जानकी को कुटिया बनानी आती है। बताया कि वाल्मीकि तो बहाना है भगवान हमसे कह रहे हैं हृदय में जगह दे दो। हमने मां-बाप, बेटा, प|ी, पति, व्यापार और सब कुछ को दिल में जगह भगवान को मंदिर में भेज दिया। जिसको हृदय में रहना चाहिए उसको पत्थर के भवन में जाकर रहना पड़ा है।

जीवन में चार प्रश्न: मैं कौन, दुनिया में क्यों आया, क्या कर रहा हूं, मुझे कहां जाना है

विजय कौशल महाराजा। लाल बहादुर स्क्ूल परिसर में चल रही श्रीराम कथा के दौरान उपस्थित श्रद्धालु।

इच्छाएं कभी पूरी नहीं होती

वाल्मीकि जी ने निवास के लिए चौदह स्थान बताए। उन्होंने राम वनवास के दौरान केवट प्रसंग का अत्यन्त मार्मिक वर्णन करते हुए कहा कि दीनहीन, अक्षम के ऊपर भगवान की करुणा, कृपा अवश्य होती है। क्योंकि ऐसे लोगों का मन अत्यंत निर्मल व पवित्र होता है उन्होंने कहा कि मनुष्य की आवश्यकता घटती जा रही है और इच्छाएं बढ़ती जा रही हैं। आवश्यकता शरीर की होती है और इच्छाएं मन की होती है। इच्छाएं कभी पूरी नही होती, बढ़ती ही जाती है। श्रीराम कथा सुनने भारी संख्या में श्रद्धालु मौजूद रहे।

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