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छत्तीसगढ़ की पहचान सुगंधित धान, वैज्ञानिकों ने सहेजी किस्में / छत्तीसगढ़ की पहचान सुगंधित धान, वैज्ञानिकों ने सहेजी किस्में

सुगंधित धान पूरे देश में पहचान रखता है। यहां जितने गढ़ हैं, धान की उतनी ही खास किस्में मौजूद हैं।

सुनील शर्मा

May 25, 2015, 05:27 AM IST
प्रदेश में जवां फूल, भोग, दुबराज, लुचई जैसी किस्में धान की उगाई जाती रही हैं
बिलासपुर छत्तीसगढ़ का सुगंधित धान पूरे देश में पहचान रखता है। यहां जितने गढ़ हैं, धान की उतनी ही खास किस्में मौजूद हैं। पर एक दौर ऐसा भी आ चुका है, जब इनमें से कई किस्में विलुप्ति की कगार पर पहुंच गई थीं। तब इंदिरा गांधी एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी ने किसानों के साथ मिलकर इन्हें सहेजा। कृषि विज्ञान केंद्रों ने भी इस काम में पूरी मदद की। महज 10-15 साल पहले तक जवा फूल, दुबराज, विष्णु भोग, लुचई जैसी सुगंधित धान की किस्में राज्य की पहचान थी। हालांकि किसानों को इनकी पैदावार से लाभ नहीं हो रहा था। धीरे-धीरे स्वर्णा, एमटीयू 1010 जैसी किस्मों को सरकार समर्थन मूल्य पर खरीदने लगी। ऐसे सुगंधित धान की कई वैरायटी विलुप्ति की कगार पर पहुंच गई। कई गांवों से तो ये गायब ही हो गई। कुछ किसान अपने उपयोग के लिए सीमित क्षेत्र में उगा रहे थे, लेकिन उनकी संख्या व एरिया सीमित था। इसे गंभीरता से लेते हुए चार साल पहले इंदिरा गांधी एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी रायपुर ने इन्हें सहेजने का बीड़ा उठाया।

कृषि वैज्ञानिकों ने राज्य के अलग-अलग इलाकों में जाकर पारंपरिक व गुणवत्ता वाली वैरायटी की पहचान करनी शुरू की। कुछ किसानों के पास सुगंधित धान के बीच थे, जिन्हें लेकर लैब और ग्रीन हाउस में रोपा, फसल हुई तो उसके बीज सहेजे गए। यूनिवर्सिटी ने डेटा बैंक के आधार क्षेत्रवार सुगंधित किस्मों की खेती का पता लगाया और वहां उन्हीं की पैदावार लेने किसानों को प्रोत्साहित किया। कृषि वैज्ञानिकों व कृषि विज्ञान केंद्रों की मेहनत रंग लाई और वे 30 से अधिक किस्मों का संग्रहण करने में सफल हुए। फिर बीज उत्पादन के क्षेत्र में विकास हुआ और चाहे बिलासपुर हो या मुंगेली, महासमुंद या धमतरी, सभी जिलों में सुगंधित धान की खेती हो रही है। हालांकि सामान्य किस्मों की तुलना में सुगंधित धान की पैदावार कम है लेकिन खत्म हो चुकी खेती के लिए यह शुरुआत भी कम नहीं है। अभी भी कृषि विज्ञान केंद्रों के माध्यम से यह अभियान जारी है।
हर क्षेत्र में अलग-अलग किस्में
राज्य में राजनांदगांव में चिन्नौर, सिहावा-नगरी में दुबराज तो अंबिकापुर में बिसनी, बिलासपुर जिले के गौरेला-पेंड्रा इलाके में विष्णुभोग, लोहंदी व लुचई किस्में पाई जाती हैं। सूरजपुर में श्याम जीरा, बेमेतरा में कुबरी मोहर, जगदलपुर में बादशाह भोग व गोपाल भोग तो रायगढ़ में जीरा फूल की खेती कुछ किसान करते हैं।
पारंपरिक के कई फायदे हैं
उत्पादन के लिए कम रासायनिक खाद की जरूरत पड़ती है तो इसमें स्टार्च की मात्रा भी अधिक होती है। इसके अलावा बालियों में छोटा व पतला दाना है जो प्राकृतिक तत्वों से भरपूर होता है। बीजों के लिए बाजार पर निर्भरता नहीं है और नई वैरायटी की तुलना में उत्पादन लागत कम आती है।
तीन गुना कम पानी की खपत
वनस्पति विज्ञान के प्राध्यापक प्रो. बीआर राठिया के मुताबिक पारंपरिक धान की खेती में हाईब्रिड की तुलना में तीन गुना कम पानी की जरूरत पड़ती है। कम बारिश हुई तब भी फसल अच्छी होती है। इसके बावजूद किसान अधिक उत्पादन के लिए स्वर्णा जैसी वैरायटी लगा रहे हैं।
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