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तहसील दफ्तर में मुफ्त मिलने वाले फॉर्म लोगों को पैसों में बेच रहे बाहर

कलेक्टोरेट दफ्तर सहित कई अहम सरकारी दफ्तरों में कई योजनाएं आज भी ऑनलाइन नहीं हो पाई है। इसके चलते लोगों को दफ्तर...

Danik Bhaskar | Jul 14, 2018, 02:25 AM IST
कलेक्टोरेट दफ्तर सहित कई अहम सरकारी दफ्तरों में कई योजनाएं आज भी ऑनलाइन नहीं हो पाई है। इसके चलते लोगों को दफ्तर के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं। इसकी आड़ में कई बाहरी तत्व उनकी जेब ढीली करते हैं। इसके बावजूद कोई इस अव्यवस्था को सुधारने पर ध्यान नहीं दे रहा है। ऐसा महीनों से जारी है।

तहसील दफ्तर के भू-अभिलेख शाखा में बीवन खसरा िनकालने के लिए आवेदन लगानी पड़ती है। यह प्रपत्र महीनों से दफ्तर में खत्म हो चुके हैं, जिसे परिसर में फोटो कॉपी सेंटर चलाने दो से पांच रुपयों में बेचता है। फॉर्म को खरीदकर भरने के बाद तहसीलदार के दस्तखत की दरकार होती है। इस प्रक्रिया के बाद इसे बाबू के पास जमा करना पड़ता है। जमा करने के बाद यहां का चक्कर लगाना आम पब्लिक की आदत में शुमार हो जाता है। तीन से चार िदन गुजरने के बाद उसे यह बात समझ आती है कि वह दलाल के जरिए काम कराता तो ज्यादा अच्छा होता है। इसके बाद वह आस-पास घूमने वाले दलाल को नगदी रकम देता है। दलाल भीतर आवेदक का नाम बताकर इसे बी-खसरे की नकल देने की सिफरिश करता है। इसके बाद यह आम जनता तक पहुंचती है। कमिनश्नरी, तहसील, कलेक्टोरेट, नगर निगम और अन्य विभागों में जमीन से संबंधित दस्तावेज हासिल करने के लिए पब्लिक परेशान होती है। इसके उन्हें रुपए चुकाने पड़ते हैं। गंभीर बात यह कि कई दफ्तरों में दस्तावेज और फाइलों को सहेजा नहीं जा रहा है, जिसके चलते इन्हें उठाने मात्र पर यह टूट रही हैं। सबसे बुरी स्थिति कलेक्टोरेट के लैंड रिकाॅर्ड रूम की है। यहां मिसल बंदोबस्त, बीवन खसरा और तहसील दफ्तरों से आदेश-निर्देश के बाद डिस्पोजल के लिए भेजे गए प्रकरण दीमकों का चारा बन रहा है। कर्मचारियों के मुताबिक धूल और गर्दो-गुबार के बीच फाइल खोजने में मशक्कत करनी पड़ती है।