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मिलावट जांचने लैब के लिए 3 साल से 3 करोड़ मंजूर पड़े हैं, कंट्रोलर दफ्तर में गुम है फाइल

आशीष दुबे | बिलासपुर 99079-01010 काेई तीन साल पुरानी बात है। नसबंदी कांड के बाद राज्य सरकार ने बिलासपुर में रीजनल लैब...

Dainik Bhaskar

Jul 10, 2018, 04:15 AM IST
मिलावट जांचने लैब के लिए 3 साल से 3 करोड़ मंजूर पड़े हैं, कंट्रोलर दफ्तर में गुम है फाइल
आशीष दुबे | बिलासपुर 99079-01010

काेई तीन साल पुरानी बात है। नसबंदी कांड के बाद राज्य सरकार ने बिलासपुर में रीजनल लैब बनाने के लिए तीन करोड़ रुपए मंजूर किए। रायपुर के फूड एवं ड्रग कंट्रोलर को इसकी जिम्मेदारी सौंपी गई। उन्होंने चिटि्ठयां चलाईं। पता चला बिलासपुर में जमीन नहीं है। इसके बाद मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। इसके कारण ही मिलावटखोरी पर नियंत्रण करना अफसरों के लिए परेशानी का कारण बना हुआ है। पूछने पर फूड एवं ड्रग कंट्रोलर अब फिर फाइल देखने की बात कह रहे हैं। उनके मुताबिक यदि ऐसा है तो इसकी प्रक्रिया जल्द बढ़ेगी।

इससे पहले राज्य सरकार ने बिलासपुर जिले में फोरेसिंक लैब के लिए चार करोड़ 23 लाख रुपए मंजूर किए। कोटा रोड पर परसदा में इसकी प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। मध्यप्रदेश से विभाजित होने के बाद वर्ष 2002 में प्रदेश की राजधानी रायपुर में राज्य फोरेंसिक लैब की स्थापना की गई है। इससे पहले राज्य बनने के बाद भी फोरेंसिक जांच के लिए पुलिस को मध्यप्रदेश की फोरेंसिक लैब का सहारा लेना पड़ता था। प्रदेश में फोरेंसिक लैब शुरू होने के बावजूद बिसरा परीक्षण समेत अन्य जांच के लिए पुलिस को काफी मशक्कत करनी पड़ती थी। साथ ही प्रदेश में एकमात्र लैब होने के कारण जांच रिपोर्ट संबंधित थानों तक पहुंचने में काफी विलंब होता था। इसके चलते पुलिस मुख्यालय व राज्य शासन ने जनवरी 2013 में जगदलपुर व मार्च 2014 में सरगुजा में क्षेत्रिय फोरेंसिक लैब शुरू की। बिलासपुर रेंज में पिछले कई सालों से क्षेत्रिय फोरेंसिक लैब शुरू करने की योजना बनाई गई थी। लेकिन इसके लिए स्वीकृति नहीं मिल पा रही थी। इस बीच केंद्र सरकार ने क्षेत्रिय कार्यालय व लैब स्थापित करने के लिए बजट भी जारी कर दिया। लेकिन जगह व राज्य शासन व पुलिस मुख्यालय से स्वीकृति नहीं मिलने के कारण क्षेत्रिय लैब शुरू नहीं हो सकी थी। हालांकि यहां लैब की स्थापना के लिए जमीन की तलाश की जा रही थी। इस बीच जिला प्रशासन ने फोरेंसिक क्षेत्रिय लैब के लिए भरनी-परसदा में करीब तीन एकड़ जमीन उपलब्ध करा दी है। यहां इसका काम शुरू हो चुका है। जबकि दवा और सामान जांचने के लिए बनने वाले लैब पर कोई ध्यान देने को तैयार नहीं है।

रायपुर में फूड, ड्रग कंट्रोलर को सौंपी गई थी निर्माण को बढ़ाने की जिम्मेदारी, चिटि्ठयां चलीं और भूमि नहीं होने की बात पर सब यथावत

9 जुलाई को प्रकाशित खबर।

ये है नियम, ऐसे करते हैं मिलावट के मापदंड तय, तीन कैटिगीरी में बांटा है

मिलावट को तीन कैटिगीरी में बांटा गया है। पहला असुरक्षा, अमानक और मिसब्रांड। किसी भी खाद्य पदार्थ जिसका सीधा वास्ता इंसान के शरीर से होता और इसमें मिलावट मिलती है तो इसे असुरक्षा की श्रेणी में रखा जाता है। यह मामला सीधे सीजीएम कोर्ट में लगता और वहां से संबंधित व्यक्ति या संस्था के खिलाफ जुर्माने या सजा का प्रावधान है। इसमें पांच लाख रुपए तक जुर्माना लग सकता है। इसके अलावा अमानक और मिस्ब्रांड का मामला एडीएम कोर्ट में लगता है। अमानक यानी कोई प्रोडक्ट खराब और मिस्ब्रांड यानी प्रोडक्ट के रैपर में दावों के अनुरूप नियमों का पालन नहीं करना। इन दोनों मामलो में तीन लाख रुपए तक जुर्माने का प्रावधान है।

मुझे फाइल देखनी होगी


कैसे रुकेगी मिलावटखोरी? लैब है नहीं, 30 लाख की वैन चलती नहीं और 10 हजार गुना बढ़ा दी जांच फीस

पिछले कई सालों से मिलावट की जांच 5 से 10 रुपए में ही हो जाती थी। पर खाद्य एवं औषधि विभाग ने एकाएक खाने-पीने की मिलावट जांच करने के लिए दाम में बढ़ोत्तरी कर दी है। किसी भी आदमी को खाद्य सामग्री की जांच कराने के लिए 5 हजार रुपए तक खर्च करने पड़ेंगे। वहीं दूध और पानी की जांच कराने के लिए 12 हजार रुपए तक खर्चा आएगा। पिछले एक-डेढ़ महीने में खाद्य सामग्रियों के मिलावट की जांच कराने के लिए आम आदमी नहीं पहुंच रहे हैं। क्योंकि एक हजार गुना चार्ज में बढ़ोत्तरी होने से लोग स्वयं मिलावटी खाद्य पदार्थों की जांच नहीं करा सकते। इसके अलावा मिलावट की जांच के लिए 30 लाख की मोबाइल वैन खरीदी गई थी। विभाग के इंस्पेक्टरों ने दावा किया था कि ये वैन बिलासपुर पहुंचेगी और पुराने बस स्टैंड सहित कई क्षेत्रों का जायजा लेगी। फूड इंस्पेक्टर के मुताबिक यह वैन दो बार बिलासपुर का निरीक्षण कर जा चुकी है। जबकि इसकी जानकारी किसी को नहीं है। इसके चलते यहां वैन चलाई गई या नहीं इस पर सवाल है।

14 दिन में किसी भी हाल में भेजनी है नमूने की रिपोर्ट

फूड एक्ट के तहत खाद्य विभाग के अधिकारी किसी भी संस्थान से मिलावट होने की शक पर सामान उठाते हैं तो उसे दूसरे ही दिन रायपुर के लैब में भेजना अनिवार्य है। इसके अलावा वहां के अधिकारियों को इनकी रिपोर्ट 14 के दिन के भीतर भेजनी है। इसके बाद यहां के अधिकारी मामले में संबंधित न्यायालय में केस फाइल करते हैं। प्रक्रिया में लेटलतीफी होती है। बड़े मामलों में दिक्कत उठानी पड़ती है।

मामला रायपुर से हैंडल कर रहे


महंगे कैमिकल से खुद अधिकारी परेशान





है मामले को दिखवा लेता हूं


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