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मोबाइल के की-बोर्ड पर अब छत्तीसगढ़ी भी, गूगल ने अपलोड किए 10 हजार शब्द

जिस तरह आप अपने मोबाइल पर अंग्रेजी, हिंदी या दूसरी भाषाओं में मैसेज टाइप करते हैं, अब उसी तरह छत्तीसगढ़ी में भी टाइप...

Danik Bhaskar | Apr 02, 2018, 02:05 AM IST
जिस तरह आप अपने मोबाइल पर अंग्रेजी, हिंदी या दूसरी भाषाओं में मैसेज टाइप करते हैं, अब उसी तरह छत्तीसगढ़ी में भी टाइप किया जा सकता है। गूगल ने छत्तीसगढ़ी के शब्दकोष के आधार पर की बोर्ड तैयार किया है। इसे बनाने में हाईकोर्ट के वकील व भिलाई के साहित्यकार संजीव तिवारी सहित अन्य ने योगदान दिया है। संजीव ने गूगल को करीब 10 हजार छत्तीसगढ़ी के शब्द टाइप कर उपलब्ध कराए। ऑटो फिल, करेक्शन की सुविधा से अब लेख व मैसेज जल्दी टाइप किए जा सकते हैं। पूरा शब्द टाइप करने की जरूरत नहीं है।

अब मोबाइल पर अन्य हिंदी, अंग्रेजी या अन्य दूसरी भाषाओं की तरह ही छत्तीसगढ़ी में भी मैसेज टाइप किया जा सकता है। मोबाइल पर भाषा चयन के विकल्प में छत्तीसगढ़ी का चयन कर ऐसा किया जा सकता है। गूगल ने बोल-चाल में आम तौर पर उपयोग में आने वाले छत्तीसगढ़ी के करीब 15 हजार शब्दों के आधार पर की बोर्ड लांच किया है। इसे तैयार करने में छत्तीसगढ़ी साहित्यकार संजीव तिवारी ने अहम योगदान दिया है। उन्होंने गूगल को छत्तीसगढ़ी के करीब 10 हजार वाक्य टाइप कर उपलब्ध कराए। हर वाक्य में करीब 6 शब्द थे। छत्तीसगढ़ी लिखने का विकल्प चुनने के बाद ऑटो स्पेल में ये शब्द आ जाते हैं, जिसका चयन कर आसानी से मैसेज टाइप किया जा सकता है।

ऑटो फिल विकल्प से छत्तीसगढ़ी

टाइप करना हुआ आसान

गूगल ने लोकभाषाओं के लिए अलग से की बोर्ड लांच किया है, इससे लोकभाषा में ऑटो फिल, सजेशन, करेक्शन आदि की सुविधा मिल रही है। अब अपनी लोकभाषा में मोबाइल पर मैसेज टाइप करना आसान हो गया है। छत्तीसगढ़ी का विकल्प चुनने के बाद ऑटो फिल की सुविधा मिलेगी, इससे पूरा शब्द टाइप नहीं करना पड़ेगा। लेख या मैसेज जल्दी टाइप किया जा सकेगा।

इनोवेशन-रिसर्च की दो खबरें

राम प्रताप सिंह| बिलासपुर

नदियों और तालाबों को बचाने सेंट्रल यूनिवर्सिटी और बिलासपुर यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर शोध कर रहे हैं। वहीं, डीपी विप्र कॉलेज की छात्रा पूनम, भारतमाता स्कूल की देवो प्रियाे गांगुली, मोनिका व मो. समीर ने भी जलकुंभी के कारण नदी और तालाबों को हो रहे नुकसान को लेकर कार्य शुरू किया। इसमें छात्रों ने डॉ. सुधीर चिपड़े के रतनपुर स्थित लैब का भ्रमण किया।

इसमें छात्रों को पता चला कि नियोचेटिना इर्कोनिया जीव ऐसा जीव है जो जलकुंभी को ही अपना भोजन बनाता है। छात्रों ने बताया कि इसे बायोलॉजिकल रिमूवल ऑफ वाटर हाट्सिंथ के नाम से जाना जाता है। नियोचेटिना इर्कोनिया जीव को जलकुंभी प्रभावित स्थानों पर डालने से यह 40 दिनों के अंदर इसे खाकर खत्म कर देते हैं। इन 40 दिनों में नियोचेटिना इर्कोनिया जीव प्रजनन कर के बढ़ जाते हैं। जलकुंभी खत्म होने के बाद ये जीव अपने आप समाप्त होने लगता है।

बंधवापारा तालाब में छात्रों ने किया उपयोग: शिक्षक पानू हालदार के निर्देशन में छात्रों ने बंधवापारा तालाब में नियोचेटिना इर्कोनिया जीव का उपयोग किया। छात्रों ने 11 नियोचेटिना इर्कोनिया जीव जलकुंभी प्रभावित तालाब में डाले। छात्रों ने बताया कि एक सप्ताह में जलकुंभी के पत्ते खत्म होने लगे। 15 दिन में पूरी तरह पत्ते खत्म हो गए। 40 दिन में जलकुंभी की जड़ भी खत्म हो गई। वहीं, जीव 48 दिनों में खुद ही जल में घुल गए।

पानी को नहीं हाेता है नुकसान

शिक्षक पानू हालदार ने बताया कि नियोचेटिना इर्कोनिया जीव से पानी को भी कोई नुकसान नहीं होता है। इसका पता चलने के बाद इस आइडिया को इंस्पायर मानक में भेजा गया। वहां से स्वीकृति मिलने के बाद इसका उपयोग बंधवापारा तालाब में किया गया। संयुक्त राष्ट्र संघ के पर्यावरण कार्यक्रम में छात्र ईको जनरेशन में इस आइडिया को प्रस्तुत करेंगे। इसके अलावा दिल्ली में संयुक्त राष्ट्र डेवलपमेंट कार्यक्रम के देश प्रमुख परियोजना प्रमजोत सिंह सोढ़ी के नेतृत्व में इस वर्ष इंदौर में होने वाले थ्री आर फोरम में अपनी प्रस्तुति छात्र देंगे। इसे लागू करने के लिए टाटा इंस्टीट्यूट आॅफ फंडामेंटल रिसर्च मुंबई (टीआईएफआर) के वैज्ञानिक आईएसआईआर प्रोग्राम के तहत शोध कार्य कर रहे हैं। इस बायोलॉजिकल तकनीक को इनोवेशन इंडिया द्वारा भी प्रोत्साहित किया गया है।

छात्रों ने किया शोध, नियोचेटिना इर्कोनिया जीव जलकुंभी को कर रहे हैं खत्म

जलकुंभी के फैलाव से इस तरह

नुकसान होता है पानी को

सेंट्रल यूनिवर्सिटी के ग्रामीण एंड प्रौद्योगिकी विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. पुष्पराज सिंह ने बताया कि जलकुंभी में 94 प्रतिशत पानी और 6 प्रतिशत अन्य चीजें पाई जाती हैं। जलकुंभी एक एेसी वनस्पति है जिसे जितना ज्यादा टेम्प्रेचर मिलता है, वह उतनी ही तेजी से ग्रोथ करता है। इससे जहां जलकुंभी नहीं होती है, वहां वाष्पीकरण से 1 लीटर पानी वाष्पित होता है, तो जहां जलकुंभी होती है, वहां का पानी 10 लीटर वाष्पित होता है। इस कारण जलकुंभी पानी के स्रोत को सूखा देती है। जलकुंभी के ऊपर होने के कारण नीचे तक सौर ऊर्जा नहीं पहुंच पाती है। इससे पानी के अंदर की आक्सीजन नियंत्रित नहीं हो पाती। इससे पानी के अंदर के जीव मरने लगते हैं।