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कार्तिकेय को रथ में बैठाकर भक्तों ने स्कंद आश्रम से निकाली कांवड़ी यात्रा

दक्षिण भारतीयों ने माघी पूर्णिमा के अवसर पर बुधवार को थाईपुसम का पर्व मनाया। इस अवसर पर सुबह कावड़ी यात्रा...

Bhaskar News Network | Last Modified - Feb 01, 2018, 02:15 AM IST

दक्षिण भारतीयों ने माघी पूर्णिमा के अवसर पर बुधवार को थाईपुसम का पर्व मनाया। इस अवसर पर सुबह कावड़ी यात्रा स्कंदाश्रम हुडको से शुरू हुई, जो अस्पताल चौक, सेंट्रल एवेन्यू मार्ग से होकर गणेश मंदिर सेक्टर-5 पहुंची। भगवान कार्तिकेय को रथ पर विराजमान कर लगभग 200 भक्त अपने कंधों पर कांवड़ लेकर यात्रा में शामिल हुए।

महिलाओं ने सिर पर कलश रखा था और भजन, संगीत ध्वनि पर नृत्य गाते हुए पैदल चलते रहे। सुबह 7.15 बजे से निकली यात्रा 10.30 बजे गणेश मंदिर पहुंची, जहां दूध, दही, शहद, चंदन, पंचामृत, कच्चे नारियल के पानी, गुलाब जल और विभूति से भगवान कार्तिकेय का अभिषेक कर आभूषणों से अलंकृत किया। 1 घंटे तक पूजा व आरती की। इसके बाद भंडारा में सैकड़ों भक्तों ने प्रसादी ली। आचार्य मणि ने बताया कि थाईपुसम पर्व व कावड़ी यात्रा आसुरी शक्तियों के विनाश और धर्म के विजय पताका को ऊंचा बनाए रखने मनाया जाता है।

रथ के पीछे महिलाएं कलश लेकर पैदल चलती रहीं।

पर्व के पीछे ऐसी है पौराणिक मान्यता

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार दो असुर भ्राता ताराकासू और सिगमावासु ने अपनी शक्तियों के माध्यम से विनाश लीला को जारी रखते हुए देव शक्तियों को चुनौती दी थी। इनके विनाश के लिए भगवान कार्तिकेय ने इड़कंप नामक अपने शिष्य को भेजा, तो उसे देखकर दोनों ही राक्षस समुद्र के भीतर एक गुफानुमा चट्‌टान के पीछे छिप गए। देवता ने उसे अपने हाथों से कावड़ी के रूप में ऊपर उठा लिया तो राक्षसाें ने वृक्ष का रूप धारण कर लिया। भगवान कार्तिकेय के शिष्य ने अपनी देव शक्ति से पेड़ के दो टुकड़े कर दिए। राक्षसों ने कार्तिकेय का चरण स्पर्श किया और क्षमा याचना की। कार्तिकेय ने उन्हें मुर्गा और मयूर का स्वरूप देकर उपकृत किया। उसी समय से वे भगवान के वाहन बन गए।

फूलों से सजे भगवान कार्तिकेय के रथ को खींचने श्रद्धालुओं को तांता लगा रहा।

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