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भक्ति पर कभी अभिमान न करें, प्रभु नहीं मिलते

ब्रजमंडल के गीता भवन में चल रहे श्रीराम कथा ज्ञान यज्ञ के आठवें दिन पं. सुनील द्विवेदी ने सीता हरण प्रसंग पर कथा...

Bhaskar News Network | Last Modified - Aug 09, 2018, 02:20 AM IST

भक्ति पर कभी अभिमान न करें, प्रभु नहीं मिलते
ब्रजमंडल के गीता भवन में चल रहे श्रीराम कथा ज्ञान यज्ञ के आठवें दिन पं. सुनील द्विवेदी ने सीता हरण प्रसंग पर कथा सुनाई। उन्होंने इसका सार बताते हुए कहा कि पति की सेवा और उनकी आज्ञा का पालन ही स्त्रियों का परम धर्म है।

भक्त को कभी भी अपनी भक्ति पर अभिमान नहीं होना चाहिए, क्योंकि प्रभु और भक्ति के बीच अभिमान पतन का कारण बन जाता है। जो व्यक्ति बल, धन, रूप और विद्या का अभिमान करता है उसका पतन निश्चित है। यदि अभिमान करना है तो यह होना चाहिए कि राम मेरे प्रभु हैं और मैं प्रभु का दास हूं। अगर यह भाव आ गया तो प्राणी का उद्धार हो जाएगा। पं. सुनील ने कथा बताते हुए कहा कि भरत मिलन के बाद प्रभु श्रीराम, लक्ष्मण और माता सीता के साथ ऋषि अत्रि के आश्रम पहुंचे, जहां उनका दिव्य स्वागत किया गया। प्रभु ने ऋषि अत्रि व माता अनुसुइया को प्रणाम किया। माता अनुसुइया ने सीताजी को दिव्य उपदेश दिया। उन्हें कहा कि स्त्री का धर्म केवल और केवल पति की सेवा ही होना चाहिए। पतिव्रता स्त्री को अपने पति के अतिरिक्त पर पुरुषों को पिता, भाई व पुत्र की दृष्टि से देखना ही देखना चाहिए।

रामकथा

बृज मंडल, गीता भवन परिसर से.-6 में 8वें दिन सीता हरण प्रसंग पर पं. सुनील द्विवेदी ने प्रभु व भक्ति के बीच का बताया संबंध

गीता भवन परिसर की कथा में रोजाना संगीतमय भजन प्रस्तुत किया जा रहा।

प्रभु के दर्शन पाकर भक्त हुए थे आनंदित

प्रभु राम ने ऋषि अगस्त्य के आश्रम पहुंचकर असुरों के नाश का संकल्प लिया। और ऋषि की आज्ञा से पंचवटी की ओर प्रस्थान किया। वहीं पर्ण कुटी बनाकर निवास करते रहे। पंचवटी के वनवासी, ऋषि, मुनि प्रभु के दर्शन पाकर अति आनंदित हो गए। यहां पर निवास करते हुए लक्ष्मण जी ने शूर्पणखा का नाक काटा, इस कारण रावण षडयंत्र कर मारीच को स्वर्ण मृग का रुप धराकर राम और लक्ष्मण को कुटिया से दूर ले जाता है और छलपूर्वक सीता का अपहरण कर लेता है।

भगवान राम ने किष्किंधा में बिताया था चातुर्मास

प्रभु सीताजी को न पाकर प्रभु राम व्यथित हो जाते हैं। वे वन में जाकर फूल पत्ती आदि से सीता का पता पूछते हैं। आगे चलकर गिद्धराज जटायु से माता सीता के बारे में समाचार प्राप्त कर गिद्धराज का उद्धार करते हैं। आगे परम भक्त हनुमान द्वारा किष्किंधा पर्वत पर सुग्रीव से मित्रता करते हैं और चातुर्मास के लिए वहीं निवास करते हैं। इस प्रकार आज की कथा के समापन के बाद आचार्य सौरभ शास्त्री एवं राजन महाराज जी के वैदिक मंत्रोच्चार से भगवान का पूजन किया और शीतला माता रामायण मंडली की महिलाओं ने आरती उतारी। इस अवसर पर आसपास के वार्डवासी भी कथा सुनने पहुंचे थे।

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