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युवा पीढ़ी को सत्संग से जोड़ने संस्कारों की दें शिक्षा

ब्रज मंडल के गीता भवन में चल रही श्रीराम कथा ज्ञान यज्ञ के सातवें दिन पं. सुनील द्विवेदी ने भरत मिलाप की कथा बताई।...

Dainik Bhaskar

Aug 08, 2018, 02:20 AM IST
युवा पीढ़ी को सत्संग से जोड़ने संस्कारों की दें शिक्षा
ब्रज मंडल के गीता भवन में चल रही श्रीराम कथा ज्ञान यज्ञ के सातवें दिन पं. सुनील द्विवेदी ने भरत मिलाप की कथा बताई। उन्होंने कहा कि संसार में संत और भगवंत में कोई अंतर नहीं होता। प्रभु मनुष्य जन्म लेकर संतों के सानिध्य में रहे।

इस तरह उन्होंने मानव जाति को संतों की महत्ता समझाई है। वे संतों की संगति से समझाना चाहते हैं कि जीवन का कल्याण चाहते हैं, तो संतो के जीवन से सीखना चाहिए। विशेष कर युवा वर्ग को, क्योंकि युवा ही इस देश का भविष्य हैं, लेकिन दुर्भाग्य की बात है कि आज युवा वर्ग सत्संग से दूर होकर नशे की गिरफ्त में है। इसमें कुछ दोष हमारा भी है क्योंकि आज हम उन्हें केवल पेट भरने की शिक्षा देते हैं। इस तरह उन्हें सनातन संस्कार से दूर करते जा रहे हैं। आधुनिकता की चकाचौंध में युवा वर्ग नशे लिप्त होकर अपने परिवार और राष्ट्र दोनों का नुकसान कर रहा हैं। इसे युवा पीढ़ी को सत्संग से जोड़ने संस्कारों की शिक्षा दें।

रामकथा

ब्रज मंडल के गीता भवन, से.-6 में आयोजन का सातवां दिन, पं. सुनील द्विवेदी ने भरत मिलाप प्रसंग से युवा पीढ़ी को दिया संदेश

कथा के दौरान संगीतमय भजनों पर महिलाएं भाव विभोर हो झूमती नजर आईं।

प्रभु ने मनुष्य जीवन लेकर संतों का किया सम्मान

पं. द्विवेदी ने प्रभु राम, माता सीता और लक्ष्मण के वनगमन प्रसंग पर कहा कि गंगा पार करने के लिए केंवट से प्रभु के अनुरोध करने का बड़ा सुंदर प्रसंग है। वे गंगा पार कर प्रयागराज पधारते हैं, जहां भरद्वाज मुनि के आश्रम में उन्हें दर्शन दिया उन्हें प्रणाम किया और उनसे मार्गदर्शन प्राप्त किया। आगे प्रभु महर्षि वाल्मीकि के आश्रम में पहुंचे, उन्हें प्रणाम किया। वाल्मीकि जी ने प्रभु श्रीराम को दिव्य उपदेश दिया। इधर श्रीराम के वियोग में महाराज दशरथ प्राण त्याग देते हैं। गुरु वशिष्ठ की आज्ञा से ननिहाल से युवराज भरत और शत्रुघ्न को बुलाया गया। उन्हें घटनाक्रम की जानकारी दी

प्रभु ने अपनी लीला में भाई से प्रेम का दिया उदाहरण

पं. द्विवेदी ने बताया कि जब भरत जी को ज्ञात होता है कि ज्येष्ठ भ्राता राम को वनवास मां कैकयी के वजह से मिली है, तो वे क्रुद्ध होकर अपनी माता का त्याग कर देते हैं। भरत जी कहते हैं कि मेरा जन्म प्रभु द्रोही के कोख से हुआ है। आगे भरतजी अपनी माताओं के साथ चित्रकूट जाते हैं और प्रभु राम से वापस लौटने का आग्रह करते हैं, लेकिन श्रीराम जी के नहीं लौटने पर वे प्रभु की चरण पादुका अपने शीश पर रख कर लौटते हैं। और सिंहासन पर चरण पादुका को विराजमान कर वे नंदी ग्राम जाकर तपस्या करते हैं। भ्रातृ प्रेम का अविस्मरणीय उदाहरण प्रभु ने अपनी लीला में प्रस्तुत किया।

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