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हिरण जैसे तपती रेत को पानी समझ लेता है, मनुष्य के लिए सुख भी वैसा ही छल

जैन साध्वी लब्धियशा ने कहा कि आत्मा को परमात्मा बनाना है गिरते हुए लोगों का आत्मिक उत्थान करें। भौतिक सुख सुविधा...

Bhaskar News Network | Last Modified - Aug 12, 2018, 02:21 AM IST

हिरण जैसे तपती रेत को पानी समझ लेता है, मनुष्य के लिए सुख भी वैसा ही छल
जैन साध्वी लब्धियशा ने कहा कि आत्मा को परमात्मा बनाना है गिरते हुए लोगों का आत्मिक उत्थान करें। भौतिक सुख सुविधा में सच्चा सुख नहीं है, लोगों की सेवा में है। यही शुद्ध धर्म है। इसकी आराधना से मुक्ति की राह खुलती है। संसार में जीव अनादि काल से हैं। जीव अर्थात् आत्मा का कर्म के साथ संयोग और इस संयोग के कारण आत्मा का भव भ्रमण अनादिकाल से चला आ रहा है।

श्री उवसग्गहरं पार्श्व तीर्थ में चल रही चातुर्मास प्रवचन शृंखला में जैन साध्वी ने कहा कि जीवन के सच्चा सुख के बारे में पंचसूत्र ग्रंथ के रचयिता परम ऋषि ने इस संसार का सही रूप बताया है। उन्होंने कहा है कि इस संसार में जिसे हम सुख मानते हैं, वह वास्तविक सुख नहीं बल्कि सुख का आभास मात्र है। रेगिस्तान में घूमता हुआ हिरण सूर्य की किरणों से चमकती रेत को जलाशय मानकर पानी पीने की आशा से दौड़ता हुआ वहां जाता है। किंतु उस स्थान पर पहुंचने पर उसे वास्तविक स्थिति का परिचय होता है कि यह जल नहीं अपितु जल का भ्रम था। ठीक उसी तरह भौतिक सुख-सुविधाओं की भूल भूलैया में घूमता व्यक्ति सुख पाने की आस में दुःख के मायाजाल में ही उलझता चला जाता है।

नगपुरा तीर्थ में चल रहा है संत समागम

नगपुरा ट्रस्ट के अध्यक्ष ने नांदेड़ से आए संतों का किया स्वागत।

अशुभ कर्मों से मिलता है दु:ख

संसार में आत्मा अनेक कर्मों का फल भोगती है। अतः संसार दु:ख रूप है। अशुभ कर्मों के कारण भविष्य में भी कर्मफल के रूप में दुःख ही मिलता है। आत्मा के अनंत गुणों और मूल स्वरूप को समझे बिना निरंतर कर्मबंधन में बंधे रहते हैं।

दु:ख से मुक्ति पाने का साधन है धर्म

उन्होंने दुःखमय संसार के यथार्थ स्वरूप का वर्णन कर उससे मुक्ति पाने का मार्ग बताया। कहा कि इस दुःखमय संसार से छुटकारा पाने का एक ही मार्ग है शुद्ध धर्म। जो दुर्गति में गिरते हुए जीव को बचा ले, उसे थाम ले, वह है धर्म। धर्म क्रिया स्वरूप नहीं है।

ईश्वर की आज्ञा के अनुसार आराधना करें

उन्होंने कहा अक्सर लोग क्रिया और भावना दोनों में से किसी एक को ही धर्म मान लेते हैं, लेकिन यह शुद्ध धर्म से दुःखमय संसार का विच्छेद है। प्रभु की आज्ञा के अनुसार एवं विधिपूर्वक अहोभाव के साथ की गई आराधना ही शुद्ध धर्म की श्रेणी में आता है। शुद्ध धर्म की आराधना से आत्मा स्वयं परमात्मा बन सकती है। यही जीवन का सही सार है। मुक्ति का द्वार है।

नांदेड़ गुरुद्वारा के अध्यक्ष का किया

प्रवचन सभा में सिक्ख धर्म के सुप्रसिद्ध नांदेड़ गुरुद्वारा के अध्यक्ष संत राज सिंग रामगढ़िया एवं धर्मगुरुओं का नगपुरा ट्रस्ट के अध्यक्ष गजराज पगारिया ने स्वागत किया। आज तपस्वी संतोष दुग्गड़ का पारणा पूर्व पचक्खाण वरघोड़ा निकाला गया। जुलूस में पुखराज दुग्गड़, भीखमचंद दुग्गड़, हीरालाल वोहरा, संपत मोदी, मोहन चोपड़ा आदि लोग शामिल हुए।

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