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डेंगू का ऐसा इलाज! स्वीपर दे रहा है दवाई फार्मासिस्ट अस्पताल में कर रहा बाबूगिरी

लालबहादुर शास्त्री अस्पताल के डॉक्टरों की लापरवाही के कारण मंगलवार को दीपाली की जान चली गई, इसके बाद भी इलाज के...

Bhaskar News Network | Last Modified - Aug 09, 2018, 02:25 AM IST

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    लालबहादुर शास्त्री अस्पताल के डॉक्टरों की लापरवाही के कारण मंगलवार को दीपाली की जान चली गई, इसके बाद भी इलाज के नाम पर लापरवाही बरकरार है। डेंगू संक्रमित क्षेत्र के इस प्रमुख अस्पताल में डेंगू मरीजों को भर्ती कर इलाज करना तो दूर की बात, यहां के डॉक्टर स्वयं उनका ब्लड प्रेशर तक नहीं लेते हैं। डेंगू मरीजों के इलाज में बीपी का अहम रोल भले हो, पुरानी परम्परा अब तक तोड़ी नहीं जा सकी है।

    डेंगू चहुंओर फैला है, फिर भी अनुभवी व काबिल स्टॉफ बाबूगिरी कर दो बजे घर चले जाते हैं, उसके बाद अगले दिन सुबह आठ बजे तक 80 बेड के इस अस्पताल को एक डॉक्टर व तीन नर्सें जैसे-तैसे चला रही हैं। एक व्यवस्था जो कि बीपी व शूगर के मरीजों के इलाज के लिए बनाई गई थी, वहां ट्रेनिंग लेने वाली छात्रों को बैठाकर डॉक्टरों ने सिर्फ बीपी के लिए अघोषित तरीके से अधिग्रहित कर लिया है। यहां बनने वाले पोस्टमार्टम हाउस के लिए जिस फोर्थ ग्रेड कर्मचारी की नियुक्ति हुई थी, उससे दवा बंटवाते हैं।

    पहले दिन सुपेला में 47 की प्लेटलेट जांच

    सभी मरीजों को दुर्ग जिला अस्पताल रेफर

    अब तक 05की मौत

    डेंगू से 5 की मौत के बाद भी खानापूर्ति, एक दिन पहले जिस सुपेला अस्पताल की लापरवाही से मौत हुई, वहां ऐसा है हाल

    भास्कर की पड़ताल में हुआ ये खुलासा

    लालबहादुर शास्त्री अस्पताल में सुबह करीब बारह बजे भास्कर की टीम पहुंची। वहां देखा कि डॉक्टरों की ओपीडी से निकलने वाला हर मरीज बगल में बने एनसीडी सेंटर में जा रहा था। वहां नर्सिंग स्कूलों की दो छात्राएं हर मरीज का बीपी लेने के बाद पर्ची पर लिख रही थी। सबने बताया कि यहां भीड़ ज्यादा होती है, इसलिए बीपी बाहर स्टाफ नर्सों से चेक कराने की परम्परा है। 20 से ज्यादा बच्चे पहुंचे थे, लेकिन किसी का भी बीपी नहीं लिया गया।

    अप्रशिक्षित से बीपी जांच: स्वास्थ्य विभाग नर्सिंग कॉलेज की छात्राओं से बीपी की जांच करवा रहे हैं।

    जानिए..सेक्टर-9 अस्पताल में कैसे होता है इलाज

    सेक्टर-9 अस्पताल, जहां डेंगू के सबसे ज्यादा मरीज भर्ती हो रहे और ठीक होने के बाद छुट्टी हो जा रही। से-9 अस्पताल का मानना है कि डेंगू का इलाज सिर्फ बुखार, ब्लड प्रेशर और प्लेटलेट मैनेज करना है। वहां के डॉक्टर सुबह शाम हर भर्ती मरीज का बीपी स्वयं लेते है। हर 4-4 घंटे पर थर्मामीटर से स्टॉफ नर्सों द्वारा बुखार नापा जाता है। प्लेटलेट मरीज की स्थिति के अनुसार चेक की जाती रहती है।

    ऐसा भी: 48 मरीजों की प्लेटलेट जांच कराई, भर्ती एक भी नहीं, सभी रेफर

    स्वास्थ्य विभाग के काहिलपन के कारण भिलाई में डेंगू बेलगाम हो गया। डेंगू को रोकने के लिए स्वास्थ्य विभाग के सक्रियता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है, कि बुधवार को लालबहादुर शास्त्री अस्पताल में 48 डेंगू संक्रमित मरीजों की प्लेटलेट जांच तो करा ली पर भर्ती एक भी नहीं किए।

    स्वीपर से बाबूगिरी: काशी डग्गर की नियुक्ति पोस्टमार्टम हाउस में हुई थी। अब बाबूगिरी करवा रहे हैं।

    ऐसा क्यों: 10 बेड के अस्पताल में 8 डेंगू मरीज भर्ती, 80 बेड में एक भी नहीं

    स्वास्थ्य विभाग शर्म महसूस करे या न करें, डेंगू संक्रमित क्षेत्र के प्रमुख अस्पताल की तस्वीरें शर्मसार करने वाली हैं। 80 बेड के लाल बहादुर शास्त्री अस्पताल में अबतक डेंगू का एक भी मरीज अबतक भर्ती नहीं किया गया है। जबकि, खुर्सीपार अस्पताल में 8 डेंगू के मरीज भर्ती है।

    डेंगू जैसे संक्रमित बीमारी फैलने के बाद भी सुपेला अस्पताल में सब जुगाड़ से चल रहा है

    फॉर्मासिस्ट से बाबूगिरी: अरूण कुमार शर्मा फॉर्मासिस्ट है। लेकिन पिछले 10 वर्षों से पर्ची काट रहे हैं।

    सीधी बात

    डॉ. बीपी तिवारी, प्रभारी चिकित्साधिकारी, सुपेला

    जरूरत के अनुसार ड्यूटी...

    फार्मासिस्ट बाबूगिरी और स्वीपर भर्ती मरीजों को दवा दे रहा, ऐसा क्यों? यहां 5 फार्मासिस्ट हैं, एक पहले से रजिस्ट्रेशन काउंटर देख रहे हैं, इसलिए वही काम लिया जा रहा है। फोर्थ ग्रेड कर्मचारी को हम जहां कमी होती है, वहां लगाते हैं।

    आपके डॉक्टरों ने किसी मरीज का बीपी नहीं लेने की परंपरा बनाई हैं? डॉक्टर द्वारा मरीज का बीपी नहीं लेने की कोई परंपरा नहीं है।

    स्टाफ की भर्ती क्यों करवाते? कर्मचारियों की कमी के कारण सबकुछ मैनेज किया जाता है।

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