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वृक्ष की तरह दूसरों को खुशी और सहारा देना सीखें तो आप भी बन सकते हैं सभी के आदर्श

हमारा यह जीवन एक वृक्ष के समान है, जिसमें बचपन रूपी अंकुर, फल-फूल से लदा हुआ यौवन और वृद्धावस्था के समान पतझड़ आता है।...

Danik Bhaskar | Aug 11, 2018, 02:41 AM IST
हमारा यह जीवन एक वृक्ष के समान है, जिसमें बचपन रूपी अंकुर, फल-फूल से लदा हुआ यौवन और वृद्धावस्था के समान पतझड़ आता है। मृत्यु आते ही सब कुछ खत्म हो जाता है, कहानी मात्र रह जाती है। उक्त बातें पार्श्व तीर्थ में साध्वी लब्धियशा श्रीजी ने कहीं।

उन्होंने कहा कि वृक्ष अपने जीवन को जिस प्रकार जीता है, जब तक उसका अस्तित्व रहेगा औरों का भला ही करेगा। उसके फल तृप्ति प्रदान करते हैं। फूल खुश्बू से तन, मन को तरोताजा बना देते हैं। पत्ते छाया में बैठने वाले को शीतलता देते हैं। हम भी वृक्ष को अपना आदर्श बनाकर परोपकार से अपने जीवन को सार्थक बना सकते हैं। वृक्ष की तरह दूसरों को खुशी और सहारा देना सीखें तो आप भी किसी के लिए आदर्श बन सकते हैं। साध्वी लक्ष्ययशा मसा ने कहा कि मनुष्य का जैसा संग होगा, वैसा ही उनमें रंग मिलेगा। अपात्र को दिया गया ज्ञान, उपदेश टिक नहीं पाता, क्योंकि वह उसके पात्र नहीं।

दादाबाड़ी मालवीय नगर में बाहर से आए भक्तों और जैन श्रीसंघों के सदस्यों का सम्मान हुआ।

पुण्य से मिली सुविधा का सीमित उपयोग करें: मणिप्रभा

धर्म श्रवण में सभी की रुचि समान नहीं है। पूर्व के संस्कार जिनके जीवन में जितने अधिक होते हैं, धर्म श्रवण, आध्यात्म में उनकी रुचि उतनी ही अधिक होती है। जिसकी जितनी लगन है, वह उसी भाव में श्रवण करता है। अभ्यास से संस्कार परिपक्व होता है, रुचि बढ़ती है और आत्मभाव बढ़ता है। यह विचार मणिप्रभा मसा ने दादाबाड़ी मालवीय नगर दुर्ग में प्रवचन के दौरान व्यक्त किए।

मसा ने कहा कि सुविधा मिलने पर मैं का झुकाव होता है। आध्यात्म में रुचि रखने वाले जिन्हें आत्मा पर विश्वास होता हैं, पंचइंद्रियों के रस के स्वाद को कम करने की कोशिश करते हैं। जिन्हें विवेक हैं वे पुण्य कर्म से मिली सुविधा का कम से कम प्रयोग करते हैं और पुण्यकार्यों में निरंतर रुचि रखते हैं। पुण्य के उदय का उपयोग परोपकार एवं परमार्थ में ज्यादा से ज्यादा करना चाहिए। सभा में महीदपुर श्रीसंघ के अध्यक्ष जवाहर दोषी का सम्मान अतुल गोलछा ने किया। सभा में समवेत शिखर तीर्थ के कमल सिंगजी रामपुरिया की तारादेवी रामपुरिया का सम्मान किया गया।

जाे श्रम और संस्कार की भावना से जीता है, वही सफल: डॉ. चंद्रप्रभा

कम्युनिटी रिपोर्टर | जामगांव आर

शुक्रवार को भखारा के चातुर्मास प्रवचन में जैन साध्वी डॉ. चंद्रप्रभा श्रीजी ने ओसवाल वंश की स्थापना पर प्रकाश डालते हुए आचार्य र|प्रभसूरी के द्वारा किए गए उपकार और ओसिया माता की महिमा से रुबरु कराया। श्रीजी ने कहा कि भारत ऋषि मुनियों के उपकार से उपकृत देश है।

गुरुकुल की ओर दृष्टि डालें तो बड़े-बड़े राजा महाराजा के वंशज भी गुरुकुल में गुरुजनों के आज्ञा का पालन करते हुए श्रम और संस्कार की प्रधानता के साथ जीवन जीते थे। धर्म और कर्म को जो लोग आज भी सच्चे ढंग अपनाते हैं, उनकी जिंदगी भाग दौड़ से दूर शान से बीतती है। देखने वालों की नजरिया ठीक हो तो समाज में ऐसे सज्जन लोग दिखने लगेंगे। उन्होंने कहा कि हिंसा कभी भी धर्म नहीं हो सकती। सभी को दुर्लभ मानव जीवन मिला है, उसका उद्दार करने के लिए अहिंसा परमो धर्म ही मार्ग है। संत मुनिराजों ने तो इसे मुक्ति का मार्ग भी बताया है। गृहस्थ का जीवन भी सयंमित होना चाहिए, यहां से अहिंसा परमो धर्म का मार्ग निकल पड़ता है।