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जो हाथ जोड़कर जीना व मुस्कुरा कर मरना जानता है, उस पर अहंकार की छाया कभी नहीं पड़ सकती

उवसग्गहरं पार्श्व के चातुर्मास प्रवचन श्रृंखला में रविवारीय अनुष्ठान के तहत नवकार महामंत्र का महत्व साध्वी...

Bhaskar News Network | Last Modified - Aug 13, 2018, 03:55 AM IST

जो हाथ जोड़कर जीना व मुस्कुरा कर मरना जानता है, उस पर अहंकार की छाया कभी नहीं पड़ सकती
उवसग्गहरं पार्श्व के चातुर्मास प्रवचन श्रृंखला में रविवारीय अनुष्ठान के तहत नवकार महामंत्र का महत्व साध्वी लब्धियशा ने बताया। उन्होंने कहा कि नमस्कार महामंत्र एक ऐसा शाश्वत मंत्र है, जिसमें किसी भी व्यक्ति, भगवान, देवता या महापुरुषों का का नाम नहीं है। इसमें मात्र सद्गुणों की शक्ति ही नाम है। ये सद्गुण जिनके भी जीवन में है, उनको इस मंत्र द्वारा नमस्कार किया गया है।

यह नमस्कार और नम्रता का प्रतीक है। अहंकार का त्याग किए बिना नमस्कार यथार्थ रूप से नहीं होता। अहंकार की ऊंची दीवार को ढहाकर ही नम्रता के वैभवशाली महल में प्रवेश किया जा सकता है। अहंकार हमें महान नहीं बनने देता। बड़ा तो वह है, जिसमें बड़प्पन है, जो बड़ाें का आदर और छोटों से प्यार करना जानता है। जो हाथ जोड़कर जीना और मुस्कुराकर मरना जानता है। वह बड़ा है, उसके जीवन में कभी अहंकार की छाया नहीं पड़ सकती। 27 उपवास के तपस्वी सजनदेवी अशोककरण मारोटी का सम्मान किया गया।

दुर्ग के दादाबाड़ी में प्रवचन सुनने रोजाना जैन समाज के महिला-पुरुष पहुंुच रहे।

मोह में पड़कर जीवन व्यर्थ न बनाएं: मणिप्रभा

शरीर आत्मा की उपस्थिति में जड़ नहीं है, सजीव है। आत्मा के बगैर शरीर, निर्जीव है, शव है। मिथ्यात्व से शरीर में मैं हूं यह भावना जीव की सदा रही है। अंनत काल की यात्रा में मनुष्य इस जीवन को भी मोह में व्यर्थ कर देता है। मोह, राग, द्वेष, अपमान, सम्मान आदि के रूप में हमारे भाव जगत में बना रहता है। मनुष्य जीवन ही मोह की दुनिया से विराम लेने का समय हैं। यह विचार मणिप्रभा मसा ने जिन कुशल जैन दादाबाड़ी, मालवीय नगर दुर्ग की सत्संग सभा में कही। मोह की दुनिया में मन चेतन से अधिक जड़ में मोह रखता है। पुरुषार्थ करें।

धर्म से जुड़कर रहें तो जीवन बनेगा आदर्श: चंद्रप्रभा

भखारा में प्रवचन के बाद बच्चों के बीच वेशभूषा प्रतियोगिता भी कराई गई।

जामगांव आर| भखारा में चातुर्मास प्रवचन में जैन साध्वी डॉ. चंद्रप्रभा श्रीजी ने आचार्य सम्राट आनंद ऋषि मसा की जन्म जयंती पर उनकी जीवनी पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि भाव से जीवन बनता है। भावना अच्छी हो तो जीवन भी सुखमय होता है। धर्म से जो लोग दिल से जुड़कर जीवन को जीते हैं, उनकी जीवनशैली समाज के लिए प्रेरणा स्रोत बन जाती है। ऐसे लोग अपने काम में मस्त रहते हुए दूसरों के काम में अनावश्यक हस्तक्षेप नहीं करते। ऐसे लोगों से समाज का मान सम्मान बढ़ता है।

वेेशभूषा स्पर्धा में रानी लक्ष्मी बाई बनी रीत नाहर प्रथम, महाराणा प्रताप बने अक्षय रायसोनी द्वितीय, भगतसिंह बने लक्ष्य सोनी तीसरे स्थान पर रहे। सम्मान किया गया।

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