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समय से पहले जन्मे बच्चों का नए वार्ड में हो जाएगा इलाज साय ने कहा- बड़े अस्पतालों की सुविधा अब जशपुर में भी

नवजात शिशु केयर वार्ड का प्रारंभ हो जाने से यहां के लोगों को अब बाहर जाकर इलाज नहीं करवाना पड़ेगा। नवजात शिशुओं का...

Danik Bhaskar | Mar 02, 2018, 02:40 AM IST
नवजात शिशु केयर वार्ड का प्रारंभ हो जाने से यहां के लोगों को अब बाहर जाकर इलाज नहीं करवाना पड़ेगा। नवजात शिशुओं का इलाज यही होगा। केन्द्रीय इस्पात एवं खनन राज्य मंत्री विष्णु देव साय ने जिला चिकित्सालय में नवजात शिशु गहन चिकित्सा वार्ड का उद्घाटन किया। 12 बिस्तर वाले इस वार्ड में 28 दिन तक के नवजात शिशुओं को रखा जाएगा।

28 लाख की लागत से निर्मित यह इकाई आधुनिक सुविधाओं और चिकित्सीय उपकरणों से परिपूर्ण इस इकाई को देखकर मंत्री श्री साय ने कहा कि बड़े शहरों के बड़े अस्पतालों जैसी सुविधा अब जशपुर में भी उपलब्ध है। इस दौरान खादी एवं ग्रामोद्योग बोर्ड के अध्यक्ष कृष्ण कुमार राय, महिला आयोग की अध्यक्ष रायमुनी भगत, जिला पंचायत उपाध्यक्ष प्रबल प्रताप सिंह जूदेव,जनपद अध्यक्ष शारदा प्रधान, कलेक्टर डॉ. प्रियंका शुक्ला, सीईओ जिला पंचायत कुलदीप शर्मा, मुख्य चिकित्सा एवं कार्यपालन अधिकारी श्री तिवारी, जिला चिकित्सालय की सिविल सर्जन श्रीमती खाखा एवं स्टॉफ उपस्थित थे।

जिले में पहली बार मिलेगी सेवा

एससीएनयू वार्ड में 12 बेड

नवजात शिशु के लिए एससीएनयू आज से शुरू हो गया है। इससे जो जन्म के समय नवजात बच्चे कमजोर रहते हैं । जिले में ही तत्काल उपचार की सुविधा मिल जाएगी। इस एससीएनयू वार्ड में 12 बेड है। जिला चिकित्सालय में कमजोर बच्चों के जन्म लेते साथ ही केयर की समस्या होती थी। इसे देखते हुए जिला चिकित्सालय में नवजात शिशु गहन चिकित्सा वार्ड की स्थापना की गई है । 28 लाख की लागत से वार्ड बनाया गया है। इस वार्ड में जन्म लेने वाले कमजोर बच्चे की सही तरीके से केयर हो सकेगा। वार्ड के शुरु हो जाने के बाद जिले के नागरिकों को पड़ोसी राज्य नहीं जाना पड़ेगा। प्राइवेट हास्पिटल में जो इलाज अधिकांश परिवारों के बूते के बाहर था, वह अब इस वार्ड में सस्ते दर पर हो सकेगा।

जानिए शिशु केयर वार्ड में कैसे होता है प्री मेच्योर बेबी का इलाज

अस्पतालों में समय पूर्व पैदा हुए बच्चों की देखभाल के लिए खास इकाई होते हैं। इन नवजात चिकित्सा इकाइयों में कांच के ट्रे होते हैं, जिनमें सही मात्रा में हवाएं गर्मी और नमी होती है। इन इकाइयों में इन बच्चों को दूध पिलाने की भी खास व्यवस्था होती है। नवजात गहन चिकित्सा इकाई के नियंत्रित वातावरण में सही गर्मी और संक्रमण की कम गुंजाइश होती है। इसलिए यहां बच्चे के जिंदा रह पाने की संभावना ज़्यादा होती है। बच्चों को कुछ हफ्तों के लिए इन इकाइयों में रखा जाता है। उसके बाद वो बाहर की परिस्थितियों के लायक हो जाते हैं। यह बदलाव धीरे-धीरे लाया जाता है। इसके लिए वार्मर फोटो थैरेपी सहित अन्य मशीन जो चिकित्सा संबंधित है।