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20x15 फीट के दड़बे में रखे जाते थे 30-35 मजदूर, प्रशासन नाखुश

पल्प फैक्ट्री में काम करने वाले श्रमिकों को जिस तरीके से चित्तूर में रखा जाता था, स्थानीय प्रशासन उससे नाराज हुआ।...

Bhaskar News Network | Last Modified - Jun 30, 2018, 02:40 AM IST

20x15 फीट के दड़बे में रखे जाते थे 30-35 मजदूर, प्रशासन नाखुश
पल्प फैक्ट्री में काम करने वाले श्रमिकों को जिस तरीके से चित्तूर में रखा जाता था, स्थानीय प्रशासन उससे नाराज हुआ। प्रशासनिक अफसरों ने 20 बाई 15 फुट के टीन के दड़बे में मजदूरों को रखे जाने पर नाराजगी जाहिर की और पक्के आवास की व्यवस्था करने कंपनी को निर्देश भी दिए। खासकर बारिश के दिनों में विशेष ध्यान रखने के भी निर्देश दिए। लेकिन सवाल यह भी उठता है कि हर माह स्थानीय श्रम विभाग की जांच के बाद भी इन परिस्थितियों से आंख मूंदकर कैसे रखा गया। कबीरधाम टीम के पहुंचने के बाद इस ओर स्थानीय प्रशासन ने सोचा। जिन बैगाओं का शोषण पल्प फैक्ट्री में हो रहा था, उन्हें स्थानीय प्रशासन ने बंधक मानने से इनकार कर दिया।

कवर्धा.इस तरह पहाड़ों से घिरे क्षेत्र में टिन शेड बनाकर दबड़े में रखते थे मजदूर।

टिन से बने कमरों में दरवाजा नहीं, बंधक कैसे

प्रशासन ने तर्क दिया कि श्रमिकों को रखे जाने वाले टिन से बने कमरों में दरवाजे ही नहीं, तो उनमें ताला ही नहीं लगाया जा सकता, ऐसे में बंधक जैसी कोई बात ही नहीं है। हालांकि, बच्चों को भी प्रशासन ने बाल श्रमिक मानने से इनकार कर दिया और आधार कार्ड में लिखे जन्मतिथि के आधार पर उन्हें बालिग करार दिया। प्रशासन के इस रवैए से चित्तूर की चाइल्ड वेलफेयर कमेटी के सदस्य नाराज बताए जाते हैं।

चारों ओर पहाड़, रुपए भी नहीं, परिस्थिति बंधक-सी

जिन मजदूरों को कबीरधाम लाया गया, उन्हें गोल्लामडुगु गांव में श्रमिक रिहायशी क्षेत्र में कंपनी रखती थी। एक-एक शेड में 30 से 35 लोग रहते थे। इन्हें रुपए नहीं दिए जाते थे, बल्कि सिर्फ सप्ताह में एक दिन राशन दे दिया जाता था। बस स्टैंड या रेलवे स्टेशन 10 से 12 किमी दूर था। जहां ये रहते थे वह घने जंगल व ऊंचे पहाड़ से घिरा है, ऐसे में साफ है कि परिस्थितियां अघोषित बंधक-सी थीं।

टीम को 7 बच्चियां मिली जताई नाराजगी

कबीरधाम की टीम की को पहले दिन यहां 7 बच्चियां मिलीं। टीम इन बच्चियों को सीडब्ल्यूडीसी सेंटर चित्तूर ले गई और आगे की कार्रवाई की तैयारी करने लगी। लेकिन अगले दिन प्रशासन ने इन्हें आधार कार्ड के हिसाब से बालिग मान लिया। ऐसे में टीम की सदस्य श्रीमती कुमारी ने आरडीओ पर मजदूरों को रखे जाने की परिस्थिति को लेकर गंभीर टिप्पणी की व नाराजगी जताई।

चित्तूर में आम की ही खेती ट्रकों में भर-भरकर आते हैं

चित्तूर में 100 से ज्यादा ऐसी फैक्ट्रियां हैं, जो मैंगो का पल्प निकालती हैं और जूस तैयार करती हैं। यह क्षेत्र आम के लिए प्रसिद्ध है। कंपनियां यहां 6 रुपए प्रति किलो दर से आम खरीदती हैं। हालांकि, खुले बाजार में आम 25 रुपए प्रतिकिलो ही है। यहां चित्तूर, तिरुपति, वेल्लोर में आम के बड़े बाग हैं और सरकार किसानों को सस्ते में अच्छे किस्म के आम के बीज भी देती है। पहाड़ों में आम के पौधे लगवाए जाते हैं।

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