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75 से ज्यादा गांवों में संकट गंभीर, लंबी दूर तय करने पर भी मिलता है गंदा पानी

भास्कर न्यूज | कवर्धा/बोड़ला. हाल ही में नीति आयोग की रपट में छत्तीसगढ़ वाटर मैनेजमेंट के मामले में एक पायदान फिसल...

Bhaskar News Network | Last Modified - Jun 17, 2018, 02:45 AM IST

75 से ज्यादा गांवों में संकट गंभीर, लंबी दूर तय करने पर भी मिलता है गंदा पानी
भास्कर न्यूज | कवर्धा/बोड़ला.

हाल ही में नीति आयोग की रपट में छत्तीसगढ़ वाटर मैनेजमेंट के मामले में एक पायदान फिसल गया। इस मामले में कबीरधाम जिले की भी बहुत बुरी स्थिति है। जिले के 75 से ज्यादा गांव ऐसे हैं, जहां पानी के लिए ग्रामीणों को लंबा सफर तय करना पड़ता है। साथ ही यहां गंदे पानी से ग्रामीणों को निर्वाह करना पड़ता है।

जिले के बोड़ला ब्लॉक के ग्राम पंचायत पीपरखूंटा के एक गांव कसईकुंडा की भी यही हालत है। ग्रामीण गांव के ही पास से बहने वाले नाले के गंदे पानी से अपनी प्यास बुझाते हैं।

ग्रामीणों को इस गंदे पानी के लिए भी 700 मीटर तक पैदल चलना पड़ता है। इसी तरह बोड़ला के भुरसीपकरी, मुकाम, दलदली, कोटनापानी, लीलादादर, आमानारा, लरबक्की, रबदा, केसमर्दा, मुंडा दादर समेत कई गांव में पानी की समस्या से जूझ रहे हैं। सचेत रहकर पानी को सहेजने की जरूरत है।

यहां भी जल प्रबंधन के लिए किए काम नाकाफी, आगे संकट गहराएगा

बोड़ला. ब्लॉक के कसईकुंडा में एक गंदे नाले से पानी भरता ग्रामीण युवक।

समझिए, यह रिपोर्ट किस तरह से जिले की हकीकत बयां कर रही

1. नीति आयोग : पानी की उपलब्धता के मामले में प्रदेश 9वें रैंक के साथ एक पायदान नीचे भी आया है। प्रदेश में 20 फीसदी भूजल स्रोत का अत्यधिक दोहन हो रहा है। 70 फीसदी लोगों को साफ पानी तक नसीब नहीं है।

कबीरधाम की हकीकत : राज्य स्वास्थ्य संसाधन केन्द्र ने हैंडपंपों की पानी की शुद्धता की जांच कराई। इसके लिए मितानिनों को एचटूएस वायल नामक किट उपलब्ध कराए। 110 मितानिनों ने अप्रैल व मई के महीने में 230 गांवों के 300 से ज्यादा हैंडपंप के पानी की जांच की। इस जांच के 24 घंटे के भीतर 61 हैंडपंप के पानी का रंग काला पड़ गया, भूमिगत जल में बैक्टीरिया होने की पुष्टि हो गई।

2. नीति आयोग : कबीरधाम समेत पूरे छत्तीसगढ़ को डार्क यलो जोन में रखा गया है। यानी इस क्षेत्र में जल प्रबंधन के मामले में काम तो हो रहे हैं, लेकिन ये काम नाकाफी हैं। रिपोर्ट में छत्तीसगढ़ को 50 से भी कम अंक मिले हैं।

कबीरधाम की हकीकत : 2016 के बाद से अब तक मनरेगा के जरिए जिला प्रशासन ने बारिश के पानी के संरक्षण के लिए काम तो किए, लेकिन मानसून की बेरुखी और कम बरसात के कारण ये काम सफल न हो पाए। पिछले दो साल में 2046 से ज्यादा डबरी खोदे गए। साथ ही 706 नए तालाब व 791 कुएं भी बनाए गए। लेकिन बारिश न होने के कारण इसका पानी सहेजा न जा सका।

डायरिया की शिकायत

पंडरिया ब्लॉक की भी यही स्थिति है, जहां ज्यादातर डायरिया की शिकायत सामने आती रही है और बैगा-आदिवासियों की मौतें भी हुई हैं। बासाटोला, भलीनदादर, कांदावानी, ढेपरापानी, बाहपानी, सेजाडीह, बसुलालूट, चातर समेत सेंदूरखार, सेजाडीह, छीरपानी, तेलियापानी लेदरा, करहापथरा, अजवाइनबाह, जामुनटोला, मराडबरा, महीडबरा, चकमकटोला जैसे गांवों में पानी की गंभीर समस्या है।

हमें सचेत होना होगा

पीएचई ने गर्मी के पहले जब जांच की, तो जिले के 400 से ज्यादा हैंडपंप का वाटर लेवल बहुत नीचे जा चुका था। वजह थी भूजल का बेतहाशा इस्तेमाल। केन्द्रीय भूजल बोर्ड से कवर्धा में ग्राउंड वाटर लेवल की स्थिति पर चौंकाने वाली रिपोर्ट दी थी। इसमें उन्होंने जिले के कई हिस्सों को पानी की उपलब्धता के मामले में सेमी क्रिटिकल जोन माना था। दूसरी ओर वाटर बजट की रिपोर्ट यह कहती है कि कबीरधाम जिले में वर्तमान में पानी की उपलब्धता 937 मिलियन क्यूबिक मीटर है, लेकिन हमारी पानी की जरूरत 2468 मिलियन क्यूबिक मीटर है, जो उपलब्ध पानी से 1530 मिलियन क्यूबिक मीटर कम है। 2020 की स्थिति और खराब होने वाली है, क्योंकि हमें दो साल बाद ही 3682 मिलियन क्यूबिक मीटर पानी की जरूरत होगी, लेकिन हमारी उपलब्धता के मुकाबले यह 2744 मिलियन क्यूबिक मीटर कम है। एक मिलियन क्यूबिक मीटर पानी 100 करोड़ लीटर पानी के बराबर होता है।

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