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चित्तूर में जिन बैगा मजदूरों का शोषण, उन्हें अधिक पैसे का लालच दे ले गए थे यूपी से आए लेबर दलाल

लेबर दलालों का सॉफ्ट टारगेट अब बैगा-आदिवासी बनने लगे हैं। आंध्रप्रदेश के चित्तूर से निकाले गए बैगा श्रमिकों के...

Danik Bhaskar | Jun 29, 2018, 02:45 AM IST
लेबर दलालों का सॉफ्ट टारगेट अब बैगा-आदिवासी बनने लगे हैं। आंध्रप्रदेश के चित्तूर से निकाले गए बैगा श्रमिकों के मामले के बाद यही निष्कर्ष निकलकर सामने आ रहा है। दरअसल चित्तूर की जिस फैक्ट्री में कवर्धा के अमनिया के बैगाओं का शोषण हो रहा था, वहीं मध्यप्रदेश के घोघरा के बैगा श्रमिक भी थे। साथ में बालाघाट के 11 श्रमिक भी यहीं फंसे थे। इतना ही नहीं अब भी इस फैक्ट्री में कवर्धा के मुनमुना के 11 लोग काम कर रहे हैं, हालांकि, इन्होंने वापस आने से मना कर दिया था। ऐसे में साफ है कि कवर्धा से लेबर दलाल बैगा-आदिवासियों को ज्यादा पैसों का लालच देकर दूसरे प्रदेशों में ले जा रहे हैं।

भास्कर ने अपनी पड़ताल में पाया कि जिले के गुड़ फैक्ट्रियों में खुद काम करने आए उत्तरप्रदेश के लेबर दलाल इस काम को अंजाम दे रहे हैं। अमनिया की सघन बाई ने जिन दो ठेकेदार गुड्डू और लाला के नाम से शिकायत की थी, वे दोनों उत्तरप्रदेश के रहने वाले हैं। पुलिस के चित्तूर में दबिश के बाद ये भाग खड़े हुए थे। चित्तूर में भास्कर ने जब मजदूरों के रिहायशी इलाकों में पूछताछ की, तब सामने आया कि यहां तमिल और उत्तरप्रदेश के मजदूर सबसे ज्यादा हैं। इसके बाद मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के मजदूरों की संख्या आती है। यहां सभी श्रमिक ठेकेदार उत्तरप्रदेश के रहने वाले थे।

जिले के 395 गुड़ फैक्ट्रियों में काम करने हर साल यूपी और हरियाणा से आते हैं लोग, एक तरह से पूरी तरह यही लोग चलाते हैं 150 से ज्यादा गुड़ फैक्ट्रियां

नॉलेज : एक साल में ही 12769 ने किया छत्तीसगढ़ से पलायन

प्रदेश सरकार के सभी को मनरेगा से मजदूरी और दूसरी सुविधाएं देने के दावे के बीच बीते एक साल में छत्तीसगढ़ के 8 जिलों से 12769 मजदूरों ने पलायन किया। बाकी के 19 जिलों के आंकड़े सामने नहीं आए हैं। इनमें महासमुंद के सबसे ज्यादा 3101 मजदूर व कबीरधाम के 2694 लोग शामिल हैं। पिछले दो साल में सरकार के पास सभी जिलों से मजदूरों को बंधक बनाने वाली 120 शिकायतें मिलीं। बंधक बने मजदूरों की संख्या 1737 थी। साल 2015-16 में 168 मजदूर छुड़ाए गए, वहीं साल 2016-17 में 93 मजदूरों को छुड़ाए गए।

छत्तीसगढ़ से पलायन के बाद छुड़ाए गए मजदूरों के कुछ बड़े मामले


गुड़ फैक्ट्री का सीजन खत्म होने पर मजदूरों को ले गए

जिले में 395 गुड़ फैक्ट्रियां चल रही थीं। 150 से ज्यादा गुड़ फैक्ट्रियां पूरी तरह उत्तरप्रदेश के लोग ही चला रहे थे। ये ग्रामीणों व आदिवासियों से गन्ना कटाई से लेकर दूसरे काम करा रहे थे। फैक्ट्री का सीजन छह महीने का होता है। सीजन खत्म होने पर इन्होंने बैगा-आदिवासियों को ज्यादा रुपए देने का लालच दिया और साथ ले गए।

कंपनी फूड्स एंड इन्स ने लेबर ठेकेदारों से जो अनुबंध (कांट्रेक्ट) किए थे, उसके मुताबिक सभी बैगा मजदूरों को 300 रुपए प्रतिदिन की रोजी तय की गई थी। ऐसे में बैगाओं को लेबर ठेकेदारों ने महीने के 9000 रुपए देने का वादा किया था। जब चित्तूर जिला प्रशासन ने मौके पर इस कांट्रेक्ट की जांच की, तो इसे आंध्र प्रदेश में तय मजदूरी के प्रावधान के खिलाफ पाया। दरअसल आंध्र प्रदेश में प्रतिदिन मजदूरी दर लगभग 320 रुपए निर्धारित की गई है। ऐसे में मजदूरों को दी जाने वाली रोजी नियमों के विपरीत थी। ऐसे में वहां मौजूद रेवेन्यू डिवीजनल ऑफिसर ने नियमों की जानकारी देते हुए कंपनी को श्रमिकों की मजदूरी 320 रुपए प्रतिदिन के हिसाब से देने के निर्देश दिए, जिसके बाद 27 मजदूरों को 5.64 लाख रुपए कंपनी ने दिए। इनमें से एक मजदूर मध्यप्रदेश के बालाघाट के थे।

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