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टॉपर्स की कोचिंग पर 60 लाख खर्च, आईआईटी और मेडिकल की दहलीज पर नहीं पहुंच सके

जिलेभर के 80 प्रतिशत से ज्यादा अंक हासिल करने वाले गणित व विज्ञान विषय के विद्यार्थियों को आईआईटियन व डॉक्टर बनाने...

Danik Bhaskar | Jun 12, 2018, 02:55 AM IST
जिलेभर के 80 प्रतिशत से ज्यादा अंक हासिल करने वाले गणित व विज्ञान विषय के विद्यार्थियों को आईआईटियन व डॉक्टर बनाने के लिए जिला प्रशासन ने 8 महीने में 60 लाख रुपए खर्च किए। लेकिन जब नतीजा आया, तो जिला फिसड्डी ही रह गया।

जिले के 254 प्रतिभावान विद्यार्थियों को एक्सपर्ट के जरिए पढ़ाई कराई गई। पहले साल 43 ने जेईई की परीक्षा दी और 27 ने नीट की। लेकिन जेईई एडवांस की परीक्षा कोई भी नहीं निकाल सका। ऐसे में आईआईटियन बनाने का प्रशासन का सपना इस साल धरा रह गया। नीट में भी अंक इतने कम आए कि मेडिकल में दाखिला असंभव ही है।

दंतेवाड़ा और सुकमा जिलों में स्कूली बच्चों को इंजीनियरिंग व मेडिकल कॉलेज में दाखिला दिलाने के लिए उठाए गए कदम की तरह ही कबीरधाम में भी एक साल पहले प्रयोग शुरू किया गया। सितंबर तक दिल्ली के विद्या क्लासेस नामक इंस्टीट्यूट को यह जिम्मेदारी सौंपी गई।

जिले में 11वीं व 12वीं के 80 फीसदी से ज्यादा अंक पाने वाले 254 बच्चों को चुना गया। इन्हें एक साल बाकायदा आवासीय ट्रेनिंग दी जानी थी। 8 महीने में इन पर 60 लाख रुपए खर्च किए गए, लेकिन जब परिणाम आए, तो वह सकारात्मक नहीं निकले।

कवर्धा.कबीरधाम जिले में टॉपर्स की आठ महीने कोचिंग चली थी।

समझिए, शासन और टॉपर्स की बर्बादी किस तरह हुई

श्रम: चार आईआईटी टीचर्स के जरिए पढ़ाई कराई गई। यह पढ़ाई 8 महीने चली। इसके पहले इस योजना को शुरू करने के लिए जद्दोजहद हुई। एक्सपर्ट टीचर्स के साथ नेशनल मोटिवेटर्स तक बुलाए गए। डीईओ, बीईओ, कलेक्टर भी समय-समय पर क्लास लेने पहुंचते। क्लास सुबह 9 से 5 बजे तक चलती।

खराब परिणाम के कारण पिछले इंस्टीट्यूट को फिर नहीं दिया काम

एक साल तक कोचिंग के बाद भी परिणाम नहीं दे पाने वाले दिल्ली के कोचिंग इंस्टीट्यूट को इस साल जिला प्रशासन ने काम देने से इनकार कर दिया है। प्रशासन ने टेंडर की प्रक्रिया भी शुरू कर दी है। इस साल फिर 60 लाख रुपए से ज्यादा कोचिंग में खर्च करने की योजना है। हालांकि, जिस विद्या कोचिंग को जिम्मेदारी सौंपी गई थी, वह रायगढ़, कांकेर, सुकमा, बीजापुर व दुर्ग में भी कोचिंग दे रहे थे।

पूंजी: एक साल में शासन ने कोचिंग के नाम पर 60 लाख रुपए खर्च किए। यानी कोचिंग के दौरान 8 महीनों में प्रत्येक बच्चों पर 23622 रुपए खर्च किए हुए। इसके अलावा कुछ बच्चों के आवास व भोजन की व्यवस्था भी की गई। इस पर भी खर्च हुए। लेकिन इसके बाद भी परिणाम सकारात्मक निकलकर नहीं आ सके।

आगे क्या : जो सफल हुए, एनआईटी और डेंटल-वेटनरी से काम चलाएंगे

जेईई के लिए 43 ने परीक्षा दी। इनमें से 3 ने मेंस की परीक्षा क्लीयर की, लेकिन एडवांस नहीं निकाल पाए। ऐसे में इन को आईआईटी में दाखिला नहीं मिलेगा। एनआईटी या दूसरे इंजीनियरिंग कॉलेज से संतोष करना होगा। सफलता का प्रतिशत महज 3 फीसदी रहा। वहीं 28 ने नीट की परीक्षा दी। इनमें से 9 ने परीक्षा पास की। अंक इतने कम हैं, कि डेंटल, वेटनरी या फिशरीज कॉलेज में ही दाखिला संभव है।

संसाधन : कोचिंग की शुरुआत पहले शहर के नवीन हायर सेकंडरी स्कूल के कमरों में की गई। दो कमरे, कुर्सी-टेबल का उपयोग किया गया। इसके बाद कचहरी पारा हायर सेकंडरी स्कूल में दो कमरे में कोचिंग की व्यवस्था की गई। इस दौरान नोट्स से लेकर अध्ययन के कई सामग्री उपलब्ध कराए गए।

ये बड़े कारण, जिनसे आईआईटी व मेडिकल में सलेक्ट नहीं हो सके

1. कोचिंग सेंटर संचालकों का मानना है कि 12वीं की परीक्षा के बाद ही कोचिंग का काम शुरु होता है और आईआईटी व मेडिकल में दाखिले के लिए कम से कम दो साल की मेहनत जरूरी है। लेकिन कवर्धा में सिर्फ 8 महीने ही मिले। यह समय अध्ययन के लिए बहुत कम थे।

2. शुरुआत में सीधे 254 बच्चों का चयन किया गया। जबकि पहले साल परीक्षा देने वाले 70 को ही चुना जाना था। कम संख्या के कारण एक-एक बच्चों पर निगरानी हो पाती। प्रशिक्षक उन्हें ज्यादा समय दे पाते। कमी यह भी थी, कि एक्सपर्ट्स को कक्षा के कोर्स पूरा कराने भी कह दिया गया।

3.योजना के मुताबिक सभी बच्चों को आवासीय प्रशिक्षण ही दिया जाना था। लेकिन नवंबर के बाद परिस्थितियां गड़बड़ा गईं। जहां बच्चों के रहने और भोजन की व्यवस्था की गई थी, वहां उन्हें खुद भोजन बनाने कह दिया गया। इससे उनके अध्ययन के समय में कमी आ गई।

हम परिणाम सकारात्मक मान रहे