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जीने के अधिकार पर वार है गलत सूचनाएं

टेक्नोलॉजी में भला करने की अद्‌भुत शक्ति है लेकिन, कुछ लोग इसका उपयोग नुकसान पहुंचाने में भी कर रहे हैं। संसद ने...

Dainik Bhaskar

Jul 27, 2018, 02:51 AM IST
जीने के अधिकार पर वार है गलत सूचनाएं
टेक्नोलॉजी में भला करने की अद्‌भुत शक्ति है लेकिन, कुछ लोग इसका उपयोग नुकसान पहुंचाने में भी कर रहे हैं। संसद ने गुरुवार को इस बात पर चर्चा की कि कैसे कुछ लोग सोशल मीडिया का उपयोग गलत सूचना देने और लोगों को उकसाने में कर रहे हैं। मैं लगभग अब तक की पूरी ज़िंदगी साइबर टेक्नोलॉजी से जुड़ा रहा हूं- माइक्रो प्रोसेसर से लेकर शुरुआती इंटरनेट व सेल्यूलर तक। 80 के उत्तरार्ध और 90 के पूर्वार्ध में सिलिकॉन वैली में मैंने इंटरनेट पर काम किया था। इसलिए टेक्नोलॉजी की खासतौर पर इंटरनेट की बदलाव लाने की क्षमताओं को लेकर मुझ में एक किस्म का जुनून है। इंटरनेट अपने स्वतंत्र और खुले चरित्र के कारण पिछले डेढ़ दशक में तेजी से बढ़ा है और इसने सरकार से लेकर आम उपभोक्ता की ज़िंदगी तक हर पहलू को छुआ है।

दशकों के भ्रष्टाचार से पिंड छुड़ाने की आकांक्षा रखने वाले और अर्थव्यवस्था तथा इनोवेशन में वैश्विक नेतृत्व की ओर छलांग लगाने वाले हमारे जैसे देश के लिए टेक्नोलॉजी को लेकर प्रतिबद्धता बहुत जरूरी है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सरकार ने टेक्नोलॉजी को अपने शासन के केंद्रीय हिस्से के रूप में लिया ताकि शासन में बड़ा बदलाव लाया जा सके, नागरिकों को अधिकार संपन्न बनाया जा सके और आर्थिक वृद्धि हासिल की जा सके। डिजिटल इंडिया की सफलता और सूचना टेक्नोलॉजी से जुड़े भारतीयों में तेजी से वृद्धि उस बदलाव का अच्छा आधार है, जो शासन और लोकसेवाओं में नागरिक चाहते हैं। वे कारण जो इंटरनेट को इतना महान बनाते हैं और सामूहिक रूप से लोगों को वैश्विक स्तर पर जोड़ते हैं; कानून तोड़ने वालों, आतंकियों और ऐसे सारे लोगों को भी मौका देते हैं जो इंटरनेट का दुरुपयोग कर वैमनस्य और हिंसा पैदा करना चाहते हैं। चूंकि लगभग 60 करोड़ भारतीय ऑनलाइन हो गए हैं और लगातार बढ़ रहे हैं, तो इस समस्या पर तत्काल ध्यान देना बहुत जरूरी है।

टेक्नोलॉजी भलाई के लिए उत्प्रेरक का काम कर सकती है लेकिन, यदि गलत हाथों में पड़ जाए तो बुराई को बहुत बढ़ा-चढ़ाकर पेश कर सकती है। मैं आपको कुछ उदाहरण याद दिलाता हूं। 5 जून 2018 को एक न्यूज रिपोर्ट और साइबर माध्यमों के मैसेजेस में दावा किया गया कि सैनिकों को अपनी वर्दी व अन्य कपड़े खरीदने के लिए खुद का पैसा खर्च करना पड़ेगा। वास्तव में फैसला यह था कि सार्वजनिक क्षेत्र के आयुध कारखानों को गोला-बारूद और अन्य आवश्यक उपकरणों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। वे वर्दी आउटसोर्स कर वस्त्र निर्माताओं से प्राप्त करें। साफ है कि कैसे कुछ लोग सैनिक कल्याण जैसे गंभीर विषय में भी राजनीतिक खेलने से बाज नहीं आते।

इसी तरह 9 और 10 जनवरी को एक संदेश खासतौर पर सोशल मीडिया पर तेजी से फैला कि 20 जनवरी 2018 से सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक सारी नि:शुल्क सेवाएं बंद कर देंगे। अंतत: 10 जनवरी को वित्त मंत्रालय में वित्तीय सेवाओं के सचिव को बयान जारी कर अफवाह का खंडन करना पड़ा। बच्चों के अपहरण के बारे में झूठे मैसेजेस तो वॉट्सएप पर वायरल हो गए, जिससे आशंकित भीड़ ने अप्रैल के बाद से दो दर्जन निर्दोष लोगों की जान ले ली और सुप्रीम कोर्ट को भी सरकार को कड़ा रवैया अपनाने का निर्देश देना पड़ा। बच्चा चुराने या अपहरण करने वाली गैंग सक्रिय होने के झूठे संदेश तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और कर्नाटक में पिछले कुछ हफ्ते से वॉट्सएप पर वायरल हो गए थे। ग्राफिक्स और व्यथित करने वाले फोटो के साथ भेजे गए मैसेजेस में दावा किया गया कि बच्चों का अपहरण कर उनकी हत्या की जा रही है ताकि उनके अंगों का व्यापार किया जा सके। उत्तेजित स्थानीय निवासी हाथ में डंडे लेकर गश्त लगाने लगे और संदेह होने पर अजनबियों की पिटाई करने लगे। ज्यादातर मामलों में शिकार व्यक्ति काम की तलाश में अन्य राज्यों से आए ‘बाहर’ के लोग थे। मसलन, बेंगुलुरू में मारा गया एक व्यक्ति राजस्थान का पान विक्रेता था।

सोशल मीडिया का ऐसा दुरुपयोग खतरनाक होता जा रहा है। मजबूत लोकतंत्रों में भी उथल-पुथल मचाने और उस पर कब्जा करने की इसकी ताकत को कम करके नहीं आंकना चाहिए। हम अमेरिकी चुनाव में विदेशी प्रभाव की जांच होते देख ही रहे हैं। भारत में भी एक प्रमुख राजनीतिक दल से कैम्ब्रिज एनालिटिका जैसी संदिग्ध एजेंसी के संबंध का पर्दाफाश हुआ है। हम देख ही चुके हैं कि उसी राजनीतिक दल ने फर्जी सोशल मीडिया अकाउंट के उपयोग को प्रोत्साहित। यह किसी नाबालिग की शरारत करने वाला मामला नहीं है- यह तो जीने के अधिकार और कानून के राज जैसे बुनियादी मूल्यों पर हमला है। मैंने संसद में यह मुद्दा उठाकर सरकार से कुछ सिफारिशें की हैं। सारे साइबर माध्यमों व एप को अधिक कड़े कदम उठाने को कहें जैसे वॉट्सएप ने फॉरवर्ड की सीमा तय कर दी है। स्पैम को ब्लॉक किया है। फोकस सिर्फ मैसेजिंग प्लेटफॉर्म पर नहीं बल्कि गूगल जैसे सर्ज इंजन पर भी होना चाहिए। इन माध्यमों और सर्च इंजनों को अधिक कड़े कदम उठाने चाहिए और यह बताना चाहिए कि गलत सूचनाओं का वायरल प्रसार रोकने के लिए वे क्या कर रहे हैं।

जैसे-जैसे हमारी अर्थव्यवस्था और हमारी ज़िंदगियां अधिकाधिक डिजिटाइज हो रही है तो क्या करना है और क्या नहीं करना है, इस बारे में और भागादारों के आचरण को मर्यादित करने वाले कानूनों पर लोगों को अधिक शिक्षित किए जाने की जरूरत है। भारतीय कानूनों के तहत डेटा तक पहुंच की भारतीय सुरक्षा एजेंसियों की मांग को पूरा करना सर्ज इंजनों व मध्यवर्ती साइबर माध्यमों के लिए अनिवार्य बनाना होगा। हमारी कानून लागू करने वाली एजेंसियां स्पैम फार्म्स का पता लगाने और अपराध को उकसाने वाली सामग्री का प्रसार करने वालों को कठघरे तक पहुंचाने में काबिल होनी चाहिए। साइबर स्पेस में मौजूद अपराधी और कानून तोड़ने वाले लोगों को कठघरे में लाकर कड़ा संदेश देना चाहिए ताकि वे ऐसा करने से बाज आए। टेक्नोलॉजी और इनोवेशन सार्वजनिक भलाई के लिए होते हैं लेकिन, जब उसी का उपयोग किसी को नुकसान पहुंचाने और अपराध करने के लिए होता है तो टेक्नोलॉजी व मध्यवर्ती संस्थाएं और सरकार को एकजुट होकर निर्णायक व ठोस कदम उठाने चाहिए ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि हमारा देश, हमारा लोकतंत्र और हमारी जीवनशैली उन लोगों का शिकार न बने, जो इन्हें नुकसान पहुंचाना चाहते हैं।

(लेखक के अपने विचार हैं।)

राजीव चंद्रशेखर टेक्नोलॉजी आंत्रप्रेन्योर एवं राज्यसभा के सांसद

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