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चीन और भारत के मनोरंजन उद्योग

चीन हमेशा ही एक ऐसी पहेली रहा है, जिसे सुलझाना कभी आसान नहीं रहा। याद आता है कि ख्वाजा अहमद अब्बास ने डॉ. कोटनीस के...

Bhaskar News Network | Last Modified - Aug 04, 2018, 03:06 AM IST

चीन और भारत के मनोरंजन उद्योग
चीन हमेशा ही एक ऐसी पहेली रहा है, जिसे सुलझाना कभी आसान नहीं रहा। याद आता है कि ख्वाजा अहमद अब्बास ने डॉ. कोटनीस के बारे में एक संक्षिप्त लेख लिखा था, जिसे डॉ. कोटनीस के सहयोगी डॉ. बसु ने पढ़ा और उनकी कई मुलाकातें हुईं। सारी जानकारियों के आधार पर उन्होंने एक किताब लिखी ‘वन हू डिड नॉट कम बैक’। साथ ही उन्होंने पटकथा लिखी जिस पर वी. शांताराम ने फिल्म बनाई ‘डॉ. कोटनीस की अमर कथा’।

फिल्म का प्रदर्शन 1946 में हुआ। शांताराम ने केंद्रीय भूमिका भी निभाई। इस फिल्म के क्लाइमैक्स में शांताराम ने एक नया प्रयोग यह किया कि डॉ. कोटनीस की विधवा प|ी अपने शिशु के साथ भारत आई हैं और डॉ. कोटनीस की मां से मिलने जाती हैं। पूरे दृश्य में डॉ. कोटनीस की आवाज आती है कि इस तरह स्टेशन पर उतरकर तांगे में बैठना और पता बताना। तांगेवाला उन्हें उसकी सास के घर ले जाएगा जहां उनकी आरती उतारी जाएगी। इस तरह दिवंगत पात्र की आवाज ध्वनिपट्‌ट पर रहेगी और दृश्य मार्मिक बन पड़ेगा। शांताराम ने अनेक प्रयोग किए हैं। एक अन्य फिल्म में अदालत का बाहरी दृश्य है और ध्वनिपट्‌ट पर जज का फैसला हम सुन सकते हैं। राजकुमार संतोषी ने ‘चाइना गेट’ नामक फूहड़ फिल्म रची। दरअसल जापान के अकिरा कुरासोव की ‘सेवन सामुराई’ से प्रेरित कई फिल्में बनी हैं, जिनमें ‘शोले’ भी शामिल है। एक और फूहड़ फिल्म का नाम है ‘चांदनी चौक टू चाइना’। एक जमाने में चीन भी भारत की तरह सामंतवाद से व्यथित था परंतु सामंतवाद से मुक्ति पाकर उन्होंने कम्युनिज्म के रास्ते पूंजीवाद के लक्ष्य को साधना प्रारंभ कर दिया है। आज चीन सबसे बड़ा पूंजी निवेशक राष्ट्र है और उसका धन इंग्लैंड के उद्योगों में भी लगा है। भारत में आठ हजार एकल सिनेमा और दो हजार स्क्रीन मल्टीप्लैक्स हैं। चीन में एकल सिनेमा पैंतालीस हजार हैं। वे विदेश में बनी फिल्मों को अपने देश में दिखाते हैं परंतु आय का केवल पंद्रह प्रतिशत फिल्म के निर्माता को देते हैं। सारा लेन देन हॉन्ग कॉन्ग स्थित बैंक के माध्यम से होता है। चीन सिनेमा के जादुई प्रभाव से भलीभांति परिचित हैं। इंदौर की महापौर मालिनी गौड़ और पार्षदों ने मनोरंजन कर पांच प्रतिशत तय किया है। पहले प्रस्तावित 20 प्रतिशत उद्योग की कमर तोड़ देता। इस मुलाकात के आयोजन में सांसद सुमित्रा ताई (लोकसभा स्पीकर) के सचिव राजेश अग्रवाल ने बहुत सहायता की। गुजरात और गोवा में पच्चीस रुपए प्रति दर्शक सिनेमाघर के रखरखाव के लिए दिए जाते हैं। छत्तीसगढ़ के मंत्रिमंडल ने एकमत से दस रुपए प्रति दर्शक सहायता राशि सिनेमा मालिक को प्राप्त हो - ऐसा निर्णय लिया है। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री महोदय से भी निवेदन किया गया है।

कम से कम मनोरंजन क्षेत्र में ही हम चीन की तरह प्रगति कर सकें तो यह बहुत बड़ी बात होगी। चीन की सरकार ने राज कपूर की ‘आवारा’ को नए सिरे से चीनी और हिन्दुस्तानी भाषा में बनाने का इरादा जताया है। ‘आवारा’ पहली भारतीय फिल्म थी, जिसने रूस, चीन और खाड़ी देशों में जबर्दस्त सफलता अर्जित की थी। वर्तमान में शांताराम की फिल्म ‘डॉ. कोटनीस की अमर कथा’ को भी नए सिरे से बनाया जा सकता है। तथ्य यह है कि डॉ. कोटनीस ने चीन में फैली महामारी के कीटाणु स्वयं के रक्त में इंजेक्शन द्वारा डाले ताकि वे उस रोग के विषय में अधिक जानकारी प्राप्त कर सकें। समस्त मानवता के कल्याण के लिए स्वयं को होम कर दिया। किंवदंती है कि एक डॉक्टर ने घातक विष पोटेशियम साइनाड का स्वाद जानने के लिए उसे जीभ पर रखा। मृत्यु पूर्व वह केवल तीन अक्षर लिख पाया जिससे निष्कर्ष निकाला गया कि जहर का स्वाद मीठा है। क्या अजीब बात है कि जहर का स्वाद मीठा है और जीवन कड़वा है क्योंकि व्यवस्था यही चाहती है कि जीवन आसान नहीं हो जाए। विज्ञान द्वारा बचाया गया समय संस्कृति को समृद्ध करने में लगाया जा सकता है। कविता लिखी जा सकती है। आज संस्कृति की दुहाई देते हुए वहशीपन को बढ़ाया जा रहा है। भारत भी चीन की तरह एक जटिल पहेली ही है।

जयप्रकाश चौकसे

jpchoukse@dbcorp.in

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