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एससी-एसटी एक्ट में तुरंत गिरफ्तारी व एफआईआर का प्रावधान फिर जोड़ने को संसद की मंजूरी

राष्ट्रपति के दस्तखत होते ही सुप्रीम कोर्ट का फैसला होगा निष्प्रभावी एजेंसी|नई दिल्ली. एससी-एसटी एक्ट में...

Dainik Bhaskar

Aug 10, 2018, 03:10 AM IST
राष्ट्रपति के दस्तखत होते ही सुप्रीम कोर्ट का फैसला होगा निष्प्रभावी

एजेंसी|नई दिल्ली. एससी-एसटी एक्ट में तुरंत गिरफ्तारी और एफआईआर दर्ज करने के प्रावधान फिर से जोड़ने संबंधी बिल गुरुवार को राज्यसभा ने ध्वनि मत से पारित कर दिया। लोकसभा इसे पहले ही पारित कर चुकी है। राष्ट्रपति के दस्तखत होते ही यह कानून बन जाएगा। इससे गत 20 मार्च के सुप्रीम कोर्ट के फैसले से कमजोर हुआ एससी-एसटी एक्ट पुराने स्वरूप में आ जाएगा। शेष|पेज 6



बिल में एससी-एसटी एक्ट के तहत आरोपी को अग्रिम जमानत नहीं देने का भी प्रावधान है। बिल में प्रावधान है कि इस कानून के तहत आपराधिक केस दर्ज करने के लिए प्रारंभिक जांच जरूरी नहीं। गिरफ्तारी के लिए भी पहले से मंजूरी जरूरी नहीं। करीब पौने दो घंटे चली चर्चा के जवाब में सामाजिक न्याय एवं अाधिकारिता मंत्री थावर चंद गहलोत ने कहा कि इस बिल में एससी-एसटी पर अत्याचार के मामलों में जल्द सुनवाई के लिए विशेष अदालतें गठित करने का प्रावधान भी है। 14 राज्यों में 195 विशेष अदालतें गठित की गई हैं। कुछ राज्यों में जिला एवं सत्र न्यायालय को विशेष अदालत घोषित किया है। एफआईआर दर्ज करने के दो माह के अंदर जांच पूरी करने तथा दो माह के अंदर विशेष अदालत में सुनवाई पूरी करने का भी इसमें प्रावधान है।

तीन तलाक बिल : प|ी का पक्ष सुन आरोपी पति को मिल सकेगी जमानत

नई दिल्ली |
मुस्लिमों में एक साथ तीन तलाक की प्रथा को गैरकानूनी बनाने के लिए तैयार बिल में गुरुवार को केंद्र ने तीन संशोधन कर दिए। कानून बनने के बाद दुरुपयोग की आशंका खत्म करने के लिए जमानत का प्रावधान जोड़ा गया है। नए प्रावधानों के तहत तीन तलाक पीड़ित महिला या उसके रिश्तेदार ही एफआईआर दर्ज करवा सकेंगे। साथ ही पति या प|ी चाहें तो मजिस्ट्रेट की इजाजत से केस वापस भी लिया जा सकेगा। शेष|पेज 6



मुस्लिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) बिल में तीनों संशोधनों को केंद्रीय कैबिनेट ने मंजूरी दी। यह बिल लोकसभा में पारित हो चुका है, जबकि राज्यसभा में लंबित है। शुक्रवार को संसद के मानसून सत्र का आखिरी दिन है। सूत्रों के अनुसार सरकार शुक्रवार को संशोधित बिल राज्यसभा में पेश कर सकती है। बिल अगर राज्यसभा में पारित हो गया तो संशोधनों पर मंजूरी लेने के लिए इसे दोबारा लाेकसभा में पेश किया जाएगा। अधिकतर विपक्षी दल इस बिल में जमानत का प्रावधान नहीं होने का विरोध कर रहे थे। कैबिनेट के फैसलों की जानकारी देने के लिए बुलाई प्रेस कॉन्फ्रेंस में कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कहा, “इस बिल को लेकर कुछ आशंकाएं जताई जा रही थीं। हमने उन्हें खत्म किया है।’ उन्होंने स्पष्ट किया कि कोई भी काम दबाव में नहीं किया गया है। इस बिल के तहत तलाक-ए-बिद्दत यानी एक साथ तीन तलाक कहकर प|ी को छोड़ना अवैध और अमान्य करार दिया गया है। ऐसा करने वाले को तीन साल तक की जेल हो सकती है। प|ी अपने और नाबालिग बच्चों के जीवन यापन हेतु भत्ता भी मांग सकती है। यह बिल महिला को नाबालिग बच्चों की कस्टडी मांगने का भी हक देता है।

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यह हैं तीनों संशोधन; महिला या रिश्तेदार ही दर्ज करवा सकेंगे एफआईआर, अदालत की मंजूरी से समझौता भी संभव:

1. एक साथ तीन तलाक का आरोपी पति ट्रायल से पहले जमानत के लिए मजिस्ट्रेट के समक्ष गुहार लगा सकेगा। प|ी का पक्ष सुनकर मजिस्ट्रेट जमानत दे सकेंगे। सरकारी सूत्रों ने कहा कि जमानत तभी दी जाएगी, जब पति बिल के प्रावधानों के अनुसार प|ी को मुआवजा दे। मुआवजा राशि मजिस्ट्रेट ही तय करेंगे।

2. एफआईआर तभी दर्ज होगी, जब तीन तलाक पीड़ित महिला, उसके रक्तसंबंधी या ससुराल पक्ष के रिश्तेदारों में से कोई पुलिस को शिकायत करे। यह डर खत्म हो जाएगा कि एेसे मामलों में पड़ोसी भी एफआईआर दर्ज करवा सकते हैं।

3. तीन तलाक का अपराध कम्पाउंडेबल होगा। कम्पाउंडेबल अपराध के मामलों में दोनों पक्षों में से कोई भी केस वापस लेने को स्वतंत्र रहता है। ऐसे में पति-प|ी के बीच विवाद का निपटारा करने के लिए मजिस्ट्रेट अपनी शक्तियां प्रयोग कर सकेंगे।

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जमानत का प्रावधान जुड़ा, लेकिन अपराध गैर जमानती ही रहेगा:

कानून मंत्री ने स्पष्ट किया कि तीन तलाक पर प्रस्तावित कानून गैर जमानती ही रहेगा। लेकिन ट्रायल शुरू होने से पहले भी जमानत के लिए आरोपी मजिस्ट्रेट से गुहार लगा सकेगा। उल्लेखनीय है कि गैर जमानती कानून के तहत पुलिस थाने में ही जमानत नहीं दे सकती है।

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सरकार ने पूछा- क्या अब भी विरोध करेंगी कांग्रेस, बसपा और टीएमसी:

रविशंकर प्रसाद ने पूछा कि बिल में जमानत का प्रावधान जोड़ने के बाद भी क्या कांग्रेस, बसपा और टीएमसी इसका विरोध करेंगी। उन्होंने कहा कि मुस्लिम और अन्य समुदायों के लोग दहेज कानून के तहत जेल जाते हैं। घरेलू हिंसा कानून के तहत भी जेल जाते हैं। तो तीन तलाक के लिए जेल भेजने का विरोध क्यों? यह प्रावधान लैंगिक समानता के लिए है। ऐसे में सोनिया गांधी, मायावती और ममता बनर्जी विरोध न करें।

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सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद भी 160 से अधिक केस आए:

कानून मंत्री ने कहा कि साल 2017 में तीन तलाक के 389 केस सामने आए। पिछले साल जनवरी और अगस्त के बीच 229 केस आए। अगस्त में ही सुप्रीम कोर्ट ने तीन तलाक पर फैसला दिया था। उसके बाद दिसंबर तक 160 केस और आए। मंत्री ने कहा कि यह आंकड़े दिखाते हैं कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा तीन तलाक को गैर कानूनी घोषित करने के बाद भी कानून जरूरी है।

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