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एससी-एसटी एक्ट में बिना जांच एफआईआर और गिरफ्तारी का प्रावधान फिर से जुड़ेगा

एससी-एसटी एक्ट के दुरुपयोग का आरोप लगाकर सुप्रीम कोर्ट ने 20 मार्च को इसके कई प्रावधानों पर शर्तें जोड़ दी थीं। लेकिन...

Bhaskar News Network | Last Modified - Aug 02, 2018, 03:26 AM IST

एससी-एसटी एक्ट के दुरुपयोग का आरोप लगाकर सुप्रीम कोर्ट ने 20 मार्च को इसके कई प्रावधानों पर शर्तें जोड़ दी थीं। लेकिन कैबिनेट ने बुधवार को मंजूर विधेयक में कानून का सुप्रीम कोर्ट के फैसले से पहले का स्वरूप बहाल करने को मंजूरी दे दी।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा था

शिकायत मिलते ही एफआईआर दर्ज नहीं होगी। पहले डीएसपी स्तर का अधिकारी जांच करेगा कि कोई केस बनता है या झूठे आरोप लगाए गए हैं।

तुरंत गिरफ्तारी नहीं होगी। सरकारी कर्मियों की गिरफ्तारी के लिए सक्षम अथॉरिटी की मंजूरी जरूरी। जो सरकारी कर्मी नहीं, उन्हें गिरफ्तार करने को एसएसपी की इजाजत जरूरी है।

एससी-एसटी एक्ट के आरोपियों भी अग्रिम जमानत का अधिकार है।

केंद्र ने अब यह किया

संशोधित कानून में एससी-एसटी एक्ट के आरोपी पर एफआईआर दर्ज करने के लिए प्राथमिक जांच की जरूरत नहीं होगी। मंजूरी जरूरी नहीं।

संशोधित विधेयक की प्रस्तावना में कहा है कि गिरफ्तार करने या नहीं करने का अधिकार जांच अधिकारी से नहीं छीन सकते। यह क्रिमिनल प्रोसीजर कोड के तहत मिला है, जिसमें प्राथमिक जांच का प्रावधान नहीं है।

एससी-एसटी एक्ट के आरोपी अग्रिम जमानत नहीं ले सकेंगे।

इधर, प्रमोशन में कोटा से जुड़े 12 साल पुराने फैसले पर कल से सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई

सरकारी नौकरियों में एससी-एसटी के प्रमोशन में कोटा से जुड़े 12 साल पुराने फैसले की सुप्रीम कोर्ट जांच करेगा। पांच जजों की संविधान पीठ देखेगी कि दोबारा विचार के लिए इसे सात जजों की बेंच को भेजने की जरूरत है या नहीं। चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अध्यक्षता में संविधान पीठ 3 अगस्त से इस पर सुनवाई शुरू करेगी। 2006 के एम नागराज फैसले में कोर्ट ने कहा था कि प्रमोशन के दौरान एससी-एसटी वर्गों पर क्रीमी लेयर कॉन्सेप्ट लागू नहीं होता। हालांकि, दो फैसलों में सुप्रीम कोर्ट पिछड़ा वर्गों पर क्रीमी लेयर लागू कर चुका था। यह दो फैसले 1992 का इंदिरा साहनी व अन्य बनाम केंद्र सरकार और 2005 का ईवी चिन्नैया बनाम आंध्र प्रदेश सरकार हैं। शेष|पेज 6



केंद्र पहले ही कह चुका है कि यह मुद्दा सात जजों की संविधान पीठ को भेजना चाहिए, क्योंकि विभिन्न आदेशों पर भ्रम के चलते रेलवे और अन्य सेवाओं में लाखों नौकरियां अटकी पड़ी हैं। कोर्ट ने गत 11 जुलाई को 2006 के फैसले पर अंतरिम रोक लगाने से इनकार कर दिया था।

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