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क्यों व्यर्थ का दिखावा खतरनाक होता है?

यह उन दिनों की बात है जब टेलीफोन कनेक्शन 15 साल, गैस कनेक्शन पांच साल और यहां तक कि बजाज स्कूटर हासिल करने में तीन साल...

Bhaskar News Network | Last Modified - Aug 05, 2018, 04:10 AM IST

क्यों व्यर्थ का दिखावा खतरनाक होता है?
यह उन दिनों की बात है जब टेलीफोन कनेक्शन 15 साल, गैस कनेक्शन पांच साल और यहां तक कि बजाज स्कूटर हासिल करने में तीन साल लग जाते थे, क्योंकि वे दिन प्रतीक्षा सूची के ही थे। आज की पीढ़ी उन दिनों की कल्पना ही नहीं कर सकती। जब मैं पहली बार मुंबई आया तो मेरे मकान मालिक के पास टेलीफोन था और मैंने देखा कि इसके कारण इलाके में उनका बड़ा प्रभाव था।

मेरे पालकों के अलावा किसी के पास टेलीफोन नंबर नहीं था और वे भी माह में एक बार 10 बजे बाद फोन लगाया करते थे, क्योंकि उस समय कॉल के आधे पैसे लगते थे। मुझे हमेशा वह कॉल लेने में अपराध बोध महूसस होता, क्योंकि मकान मालिक का पूरा परिवार वहां पजामा पहने उनींदी आंखों से वहां बैठा होता और मुझे फिर कॉल आने का इंतजार करते हुए देखता रहता। ईश्वर ही जानता है कि यह मुंबई की ‘अंडा सेल’ में जाने जैसा अनुभव होता, जहां अजमल कसाब को रखा गया था। मकान मालिक का परिवार हर तरह के प्रश्न पूछता रहता जैसे ‘पिछले शनिवार को नीली सलवार में तुमसे मिलने आई वह लड़की कौन थी, वह इतनी देर तक वहां क्यों रही’, इसी तरह की कई अन्य व्यक्तिगत बातों के ब्योरे वे पूछते। मुझे हमेशा यह फिक्र लगी रहती कि वे मेरे पालकों को कोई गलत जानकारी न दे दें। उसी वक्त मैंने तय कर लिया कि जब मैं पूरा घर किराये पर लूंगा तो एक फोन कनेक्शन भी लूंगा।

जब मेरी प|ी ने दूर के उपनगर डोंबिवली में अपना पहला मकान लिया तो मैंने अपने तब के संपादक इंडिया टीवी के रजत शर्मा के मार्फत तत्कालीन केंद्रीय संचार मंत्री संजय सिंह से संपर्क दिखाकर सात दिन में फोन कनेक्शन हासिल कर लिया। अब तक आप यह तो समझ गए होंगे कि न तो मेरे पास मकान खरीदने के पैसे थे और न मैं मंत्री महोदय को व्यक्तिगत रूप से जानता था। अचानक लोगों ने एक काला वायर टेलीफोन के खम्भे से मेरे घर में जाते देखा और रातोरात मैं हीरो बन गया। लेकिन, जब फोन लग गया तो मेरी चाल किसी राजा जैसी हो गई। लोग मेरा नंबर मांगते और दिखावे के लिए मैं दे भी देता। धीरे-धीरे उनके कॉल की संख्या हमारे कॉल्स से ज्यादा हो गई और मेरी भूमिका ऑफिस असिस्टेंट जैसी हो गई!

उन दिनों जब टेलीफोन की घंटी बजती तो लोग तत्काल जवाब नहीं देते थे। वे बालकनी में आकर आसपास निगाह डालते कि कोई देख रहा है या नहीं और फिर फोन का जवाब देते। कॉर्डलेस फोन ने तो यह अहंकार और भी बढ़ा दिया। मैं भी इस जाल में फंस गया। मैं दोपहर के वक्त ऑफिस से कई बार फोन करता, जब घर पर कोई नहीं होता था। शाम को जब मैं लौटता तो बिल्डिंग में से कोई कहता, ‘पूरी दोपहर आपके फोन की घंटी बजती रही, हो सकता है कोई आपसे संपर्क करना चाहता हो।’ उनकी ऐसी बातों ने मेरे अहंकार को और फुला दिया।

लेकिन, एक दिन अहंकार का यह गुब्बारा फूट गया। जिनसे ज्यादा पहचान नहीं थी ऐसे लोगों ने भी अपने विजिटिंग कार्ड पर c/o के चिह्न के साथ मेरा नंबर छपवा लिया। फोन रात 11:30 बजे बजने लगा और फोन करने वाला यह पूछने की गुस्ताखी भी कर लेता, ‘क्या आप इतनी जल्दी सो जाते है?’ अज्ञात लोगों के फोन से होने वाली परेशानी का बुरा असर मेरे रिश्तेदारों के फोन कॉल पर पड़ने लगा। एक रात जब पिताजी ने यह बताने के लिए कॉल किया कि कैंसर से पीड़ित मेरी मां की तबियत खराब होने के कारण उन्हें टाटा मेमोरियल हॉस्पिटल ले जाया गया है तो मैं फोन करने वाले पर झल्ला गया, बिना यह समझे कि ये तो मेरे पिताजी हैं। हालांकि, मैंने अपने क्रोध का कारण बाद में बताया पर मैं शर्मिंदा था। अगले दिन मेरे पिताजी ने कहा, ‘टेलीफोन की यह समस्या तो तुम्हीं ने पैदा की है। तुमने दिखावा किया कि तुम्हारे पास फोन है। दूसरों को दोष देने से क्या फायदा? वे तुम्हारे पास इसलिए आते हैं कि उनके पास फोन नहीं है।’ उनकी बात कितनी सही थी। कामयाब लोग कभी अपनी खरीदी चीजों का सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर दिखावा नहीं करते। किसी ने मुझे बताया कि आयकर अधिकारी आपकी सोशल पोस्ट पर निगाह रखते हैं ताकि आपको पकड़ सकें।

फंडा यह है कि दिखावा करना किसी भी युग में खतरनाक ही होता है।

मैनेजमेंट फंडा एन. रघुरामन की आवाज में मोबाइल पर सुनने के लिए टाइप करें FUNDA और SMS भेजें 9200001164 पर

एन. रघुरामन

मैनेजमेंट गुरु

raghu@dbcorp.in

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