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ग्रामीणों ने भी बदली सोच: पेड़ काटना छोड़ अब सूखी लकड़ियों से होली जलाकर बचा रहे जंगल

होली पर्व की तैयारी फागुन मास लगते ही शुरू हो जाती है। शुक्रवार को रंगोत्सव मनाया जाएगा। लेकिन वनांचल में अब बदलाव...

Bhaskar News Network | Last Modified - Mar 02, 2018, 02:55 AM IST

ग्रामीणों ने भी बदली सोच: पेड़ काटना छोड़ अब सूखी लकड़ियों से होली जलाकर बचा रहे जंगल
होली पर्व की तैयारी फागुन मास लगते ही शुरू हो जाती है। शुक्रवार को रंगोत्सव मनाया जाएगा। लेकिन वनांचल में अब बदलाव की शुरूआत हो गई है। पहले लोग बड़े-बड़े पेड़ को काटकर होलिका बनाते थे। अब वहीं ग्रामीण जंगल को बचाने सूखी लकड़ी से होलिका बनाकर दहन करने लगे हैं। ग्राम बुंदेली, जिल्गा, बरपाली, बोतली, नवापारा के ग्रामीणों का कहना है कि लकड़ी काटेंगे तो आने वाली पीढ़ी जंगल भी नहीं देख पाएगी।

ग्राम बुंदेली के गणपति प्रसाद दुबे ने कहा बुजुर्गों के साथ युवाओं ने इसकी पहल की है। पहले होलिका बनाने पेड़ों को काट दिया जाता था। इस पर सभी ने मिलकर प्रतिबंध लगा दिया है। सूखे लकड़ियों से ही होलिका बनाई जाती है। अब दोपहर तक रंग-गुलाल खेलते हैं। गांव के राजकुमार कश्यप, वेदूराम पटेल, जगदीश प्रसाद केंवट का कहना है कि अब नैचुरल रंगों का ही उपयोग अधिक होती है। पहले दिनभर गांव में हुल्लड़ होता था। अब यह प्रथा भी बंद हो गई है। ग्राम जिल्गा, बरपाली के रामसिंह, मनमोहन का कहना है कि होली का पर्व खुशियों का पर्व है। जंगल अब कम हो रहे हैं। इसकी वजह से हाथी के साथ जानवर भी जंगल से निकलकर गांव की ओर रूख कर रहे हैं।

शुक्रवार 02 मार्च, 2018

ग्रामीणों ने कहा-पेड़ काटेंगे तो आने वाली पीढ़ी जंगल ही नहीं देख पाएगी

गुलाल व राख का अधिक उपयोग:जिल्गा के अक्तीराम व सुमित ने बताया कि पहले होली में पिचकारी का प्रयोग भी अधिक होता था, अब इसमें भी कमी आई है। लोग रंग-गुलाल का अधिक उपयोग करते हैं। साथ ही होलिका दहन के बाद राख को एक-दूसरे पर लगाते हैं। इससे कई फायदे भी हैं। केमिकल रंगों से बच जाते हैं। साथ ही पानी का उपयोग कम होता है। वनांचल के गांवों में पहले चार दिनों तक होली पर्व मनाते थे। इस दौरान रंग-गुलाल के साथ लोग मदमस्त भी रहते थे। अब एक ही दिन पर्व मनाते हैं। बंधन सिंह ने बताया कि इससे गांवों में अशांति अधिक होती थी। यह प्रथा भी अब गांव में बंद हो गई है। इसके पीछे लोगों में जागरूकता भी प्रमुख कारण हैं।

फाल्गुन कृष्ण पक्ष- 2, 2074

इन गांवों में पहले से ही कुल्हाड़ी बंदी :वनांचल ग्राम बोतली, नवापारा, चैनपुर, बांधापाली, पीड़िया समेत आसपास गांवों में कुल्हाड़ी बंदी लागू हैं। लोग पेड़ों को काटने से परहेज करते हैं। ग्राम खरहरी में तो 150 साल पहले से होलिका दहन नहीं किया जाता। इसके पीछे अलग ही मान्यता है। इसके बाद भी गांव की महिलाएं हर साल रक्षाबंधन में पेड़ों को राखी बांधकर रक्षा का संकल्प लेती हैं।

शराब बंदी के लिए आगे आई महिलाएं :ग्राम बुंदेली में लक्ष्मी स्व सहायता समूह की महिलाएं गांव में शराब बंदी के लिए अभियान चला रही है। गायत्री साहू, सुमित्रा साहू, बीना साहू, सुनीता साहू का कहना है कि इसमें अभी पूरी तरह सफलता नहीं मिली है। लेकिन त्योहारों में लोग नशे का कम ही उपयोग करते हैं।

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