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शहर में डायलिसिस सेंटर की नींव रखने वाले मोंटू दादा का निधन

Dainik Bhaskar

Jan 14, 2019, 02:51 AM IST

Korba News - शहर में सेवा कार्य के लिए पहचान बनाने वाले मोंटू दादा विजय चक्रवर्ती (81) का रविवार को आकस्मिक निधन हो गया। 10 साल से...

Korba News - chhattisgarh news monto dada passes the foundation of dialysis center in the city
शहर में सेवा कार्य के लिए पहचान बनाने वाले मोंटू दादा विजय चक्रवर्ती (81) का रविवार को आकस्मिक निधन हो गया। 10 साल से डायलिसिस पर रहने के बाद भी हमेशा जिंदादिली का जीवन जीने वाले मोंटू ने लायंस क्लब के माध्यम से शहर में डायलिसिस सेंटर खुलवाने में अहम भूमिका निभाई। इसका लाभ शहर के लोगों को मिल रहा है। उनका अंतिम संस्कार सोमवार को सुबह 11 बजे मोतीसागर पारा मुक्तिधाम में किया जाएगा। वे अपने पीछे में प|ी, एक बेटा विनय चक्रवर्ती व दो बेटियों से भरापूरा परिवार छोड़ गए हैं। मोंटू दादा की 10 साल पहले उनकी दोनों किडनी फेल हो गईं थी। उन्होंने लायंस क्लब में लंबा समय दिया है। क्लब के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर रहते हुए सेवा कार्य को बेहतर बनाया। उन्हें मार्च-अप्रैल 2008 में उस समय पता चला कि वे उनकी किडनी फेल हो चुकी है जब कोरबा, बिलासपुर, अंबिकापुर ही नहीं रायपुर के मेकाहारा में भी डायलिसिस सेंटर नहीं था। ऐसे में दादा को भावनगर गुजरात जाकर डायलिसिस कराना पड़ता था। इसके लिए होने वाली परेशानियों को भला उनसे अधिक कौन जान सकता है। लायंस क्लब में सक्रिय व वरिष्ठ सदस्य होने के नाते उन्होंने अपने शहर में ही डायलिसिस सेंटर स्थापित करने का जिद किया। वह लायंस क्लब की मदद से मार्च 2010 में अपना संकल्प पूरा करने में वे कामयाब रहे। टीपीनगर में स्थापित इस केन्द्र में तात्कालिक तौर पर मात्र 1 सिस्टम लगा था। वहां अब 6 डायलिसिस सिस्टम लग चुके हैं। सेंटर में अब तक करीब 5 हजार से अधिक बार पीड़ितों को डायलिसिस की सुविधा मिल चुकी है। इसके अलावा उन्होंने कई सामाजिक कार्य व शहर के विकास के हुए आंदोलनों में भी सक्रिय भूमिका निभाई।

साथियों को न्याय नहीं मिलता देख नौकरी छोड़ी थी

19 अगस्त 1989 में कोरबा आए मोंटू दादा सीएसईबी (100 मेगावाट) कर्मी थे। श्रमिकों की समस्याएं दूर नहीं होने पर उनके लिए संघर्ष में वे आगे रहे। लेकिन एक समय ऐसा आया जब उन्होंने कंपनी की नौकरी छोड़कर वहीं एक कोने में होटल खोल लिए। होटल को व्यवसायिक दृष्टि से नहीं बल्कि कर्मचारी साथियों की सेवा की दृष्टि से खोला था। कई साथी ऐसे रहते थे जिनके पास पैसे नहीं होते थे इसके बाद उन्हें भरपेट खाना खिलाते थे।

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