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लंबी दूरी की ट्रेनों के ठहराव की पांच साल से कर रहे मांग, सुनवाई अब तक नहीं हुई

दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे बिलासपुर जोन व डिवीजन में वर्ष 2013-14 से अब तक जितने भी अफसर पदस्थ हुए सभी की नजर यहां के कोल...

Bhaskar News Network | Last Modified - May 01, 2018, 03:10 AM IST

लंबी दूरी की ट्रेनों के ठहराव की पांच साल से कर रहे मांग, सुनवाई अब तक नहीं हुई
दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे बिलासपुर जोन व डिवीजन में वर्ष 2013-14 से अब तक जितने भी अफसर पदस्थ हुए सभी की नजर यहां के कोल डिस्पेच पर ही है। श्रमिक संगठन, जिला चेंबर ऑफ कामर्स, रेल संघर्ष समिति के साथ राजनीतिक दलों की ओर से लंबी दूरी के लिए ट्रेन की मांग की जाती रही है। इस तरह की मांग बीते 5 साल से चल रही हैैं। लेकिन जोन व डिवीजन के अफसर मांगों को अपने दफ्तर तक ही सीमित रखते हैं। जिसका खामियाजा यहां के लोगों को भुगतना पड़ रहा है।

इंटरसिटी, जनशताब्दी एक्सप्रेस जो यहां के लोगों को सीधे राजधानी से जोड़ेंगी। वहीं असम में कामाख्या, गोंदिया-बरौनी एक्सप्रेस का दो दिन फेरा कोरबा से कर यहां के लोगों को लाभ दिलाने की मांग जून 2014 से अब तक चली आ रही है। मांग ऐसी भी नहीं कि रेलवे को उसके लिए काफी एग्जामिन करनी पड़े। किस ट्रेन को किस समय कहां से चलाया जाए कि उक्त रूट की कोई अन्य ट्रेन प्रभावित न हों। इसके बाद भी इन मांगों को रेल प्रशासन रेलवे बोर्ड को भेजने की जहमत नहीं उठाता। कभी-कभी यहां दौरे पर आने वाले अधिकारी गुमराह करने के लिए जरूर बोल देते हैं कि प्रस्ताव बोर्ड को भेजा गया है। लेकिन उनकी ओर से यह कभी नहीं बताया जाता कि बोर्ड ने उनके प्रस्ताव पर क्या जवाब दिया। हकीकत तो यह है कि जोनल मुख्यालय व डिवीजन मुख्यालय बिलासपुर में होने के बाद भी कोरबा के लोगों की मांगों को अफसर तवज्जो देना बंद कर दिए हैं। यहां तक कि उनके अधिकार में होने के बाद भी मांगों को यह कहकर दरकिनार किया जाने लगा है कि उनके अधिकार में नहीं है।

इंटरसिटी, जनशताब्दी एक्सप्रेस यहां के लोगों को राजधानी से जोड़ेंगी

ट्रेन आने के पहले रेलवे स्टेशन में यात्रियों की भीड़ लग जाती है।

पूर्ववर्ती अफसर किस अधिकार से चलाए ट्रेन, अब नहीं हो रही सुनवाई

जिला चेंबर ऑफ कामर्स एंड इंडस्ट्रीज के उपाध्यक्ष व रेल मामलों के जानकार रामकिशन अग्रवाल वर्ष 2014 से रेल सेवा बढ़ाने की मांग कर रहे हैं। अफसर अधिकार में नहीं होने की बात तो करते हैं लेकिन उस पर कभी एग्जामिन नहीं करते। पूर्ववर्ती अफसरों को कौन सा अधिकार मिला था कि वे लंबी दूरी की ट्रेन चला दिए जिसका लाभ आज तक लोगों को मिल रहा है।

भास्कर संवाददाता। कोरबा

दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे बिलासपुर जोन व डिवीजन में वर्ष 2013-14 से अब तक जितने भी अफसर पदस्थ हुए सभी की नजर यहां के कोल डिस्पेच पर ही है। श्रमिक संगठन, जिला चेंबर ऑफ कामर्स, रेल संघर्ष समिति के साथ राजनीतिक दलों की ओर से लंबी दूरी के लिए ट्रेन की मांग की जाती रही है। इस तरह की मांग बीते 5 साल से चल रही हैैं। लेकिन जोन व डिवीजन के अफसर मांगों को अपने दफ्तर तक ही सीमित रखते हैं। जिसका खामियाजा यहां के लोगों को भुगतना पड़ रहा है।

इंटरसिटी, जनशताब्दी एक्सप्रेस जो यहां के लोगों को सीधे राजधानी से जोड़ेंगी। वहीं असम में कामाख्या, गोंदिया-बरौनी एक्सप्रेस का दो दिन फेरा कोरबा से कर यहां के लोगों को लाभ दिलाने की मांग जून 2014 से अब तक चली आ रही है। मांग ऐसी भी नहीं कि रेलवे को उसके लिए काफी एग्जामिन करनी पड़े। किस ट्रेन को किस समय कहां से चलाया जाए कि उक्त रूट की कोई अन्य ट्रेन प्रभावित न हों। इसके बाद भी इन मांगों को रेल प्रशासन रेलवे बोर्ड को भेजने की जहमत नहीं उठाता। कभी-कभी यहां दौरे पर आने वाले अधिकारी गुमराह करने के लिए जरूर बोल देते हैं कि प्रस्ताव बोर्ड को भेजा गया है। लेकिन उनकी ओर से यह कभी नहीं बताया जाता कि बोर्ड ने उनके प्रस्ताव पर क्या जवाब दिया। हकीकत तो यह है कि जोनल मुख्यालय व डिवीजन मुख्यालय बिलासपुर में होने के बाद भी कोरबा के लोगों की मांगों को अफसर तवज्जो देना बंद कर दिए हैं। यहां तक कि उनके अधिकार में होने के बाद भी मांगों को यह कहकर दरकिनार किया जाने लगा है कि उनके अधिकार में नहीं है।

बयानबाजी छोड़ें, कर्तव्य निभाएं

10 साल पहले दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे बिलासपुर में सीनियर डीओएम रहे अजय शकंर झा की ही देन साउथ बिहार एक्सप्रेस है। जब वे दमरे हैदराबाद में पदस्थ हुए तो हैदराबाद-कोरबा, हैदराबाद-रक्सोल, सिकंदराबाद-दरभंगा साप्ताहिक ट्रेन चलाकर क्षेत्र विशेष को लाभ पहुंचाए। यहां तो डीआरएम व जीएम अपने आपको को मजबूर मानते हैं। रेल मामलों के जानकार रामकिशन अग्रवाल ने कहा कि रेल अफसर बयानबाजी छोड़ें, कर्तव्यों का निर्वहन करें।

63 फीसदी आक्यूपेंसी फिर भी बंद कर दिया

वर्ष 2013-14 में ऐन लोकसभा चुनाव के पूर्व कोरबा से दुर्ग के बीच 3 माह के लिए सुपरफास्ट स्पेशल ट्रेन चली थी। जिससे रेलवे को 63 फीसदी आक्यूपेंशी मिली। बावजूद इसके रेल प्रशासन ने उसे बंद कर दिया। रेलवे को यह बताना होगा कि क्या देश के सभी राज्यों में ट्रेनों का परिचालन केवल रेवेन्यू बढ़ाने के लिए ही होता है।

उड़ीसा समेत अन्य राज्यों में चल रही हैं लंबी दूरी की ट्रेनें

देश का उड़ीसा एक ऐसा राज्य है जहां के छोटे-छोटे शहर भी सुफरफास्ट ट्रेनों की सेवा से जुड़े हैं। पुरी व भुवनेश्वर से छोटे-छोटे कस्बों को जोड़ने 17 जोड़ी इंटरसिटी एक्सप्रेस वहां दौड़ रही हैं। यूपी व बिहार में तो जनता को मांगने की जरूरत ही नहीं पड़ती। क्योंकि सुविधा लेने के लिए वहां के जनप्रतिनिधि गंभीर हैं।

अपना राज्य फिर भी पांच शहरों को मिल रही तवज्जो

यात्री ट्रेन चलाने का मामला हो या कोई और विकास की बात। केन्द्र या राज्य सरकारें जब भी विकास की बात करते हैं उसमें कोरबा का कहीं नाम नहीं रहता। यह यहां के लोगों का दुर्भाग्य ही है।

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