यदि उद्देश्य सही है तो फिर उसमें बंधन नहीं हो सकते

Koria News - हाल ही में मैं महाराष्ट्र में रायगढ़ से पुणे होते हुए र|ागिरी के टूर पर गया था। जिस गांव में मुझे पहुंचना था वह...

Bhaskar News Network

May 18, 2019, 07:11 AM IST
Koria News - chhattisgarh news if the objective is right then it can not be binding
हाल ही में मैं महाराष्ट्र में रायगढ़ से पुणे होते हुए र|ागिरी के टूर पर गया था। जिस गांव में मुझे पहुंचना था वह मुख्य मार्ग से करीब 60 किलोमीटर अंदर था और वहां न तो नेटवर्क था और न ही जीपीएस। इसलिए मुझे वहीं रुककर लेने आ रहे व्यक्ति का इंतजार करना था। यह जिम्मेदारी लक्ष्मण नाम के व्यक्ति को दी गई थी लेकिन, उसकी बस चूक गई और वह मुझे लेने के लिए दो घंटे देर से पहुंचा, क्योंकि उस गांव से होकर जाने वाली दूसरी बस अगले दो घंटे बाद ही आने वाली थी। लक्ष्मण बस इसलिए नहीं पकड़ पाया था, क्योंकि वह बस पर लगा साइनबोर्ड पढ़ ही नहीं पाया था कि वह हाईवे की ओर जा रही है और वह उसी जगह पर खड़ा रह गया! आखिरकार जब हम मिले तो उसने माना कि वह न तो अक्षर पढ़ सकता है और न ही नंबर। इस पर उसे गर्व था, क्योंकि वहां पर उसके जैसे सैकड़ों लोग और भी थे। ये बड़ी हैरानी की बात थी कि जब पढ़े-लिखे लोगों से तुलना की बात आई तो वह अपनी ऐसी स्थिति को लेकर जरा भी नाखुश नहीं था।

लक्ष्मण की वजह से मुझे अपने गांव के नारियल बेचने वाले मुत्थु की याद आ गई, जिसने अपना पूरा जीवन इसी तरह की निरक्षरता में बिता दिया। लेकिन, वह बड़ा होशियार था। राज्य परिवहन की बसों के कंडक्टरों और ड्रायवरों को सस्ते में और कई बार मुफ्त में नारियल पानी पिलाकर उसने उनके साथ अच्छी दोस्ती कर ली थी और उसकी पहचान ऐसी हो गई थी कि अगर वह किसी दूसरे गांव की ओर जा रहा होता और बस के ड्रायवर या कंडक्टर को उसकी पीठ भी दिखाई देती तो वे उसे पहचान कर बस रोक देते थे और उससे पूछते थे कि वह कहां जा रहा है और फिर उसे मुफ्त में लिफ्ट मिल जाती थी। निश्चित रूप से इसकी वजह उसका नारियल पानी और व्यवहार था। ये रायगढ़ का वही इलाका था जहां मैं तीन साल पहले 2016 में भी आया था जब राज्य सरकार ने 13,817 सरकारी स्कूलों को कारण बताओ नोटिस जारी करके यह पूछा था कि, क्यों न उनके स्कूल को बंद कर दिया जाए? ऐसे नोटिस के पीछे की वजह यह थी कि इन स्कूलों में 20 से भी कम बच्चे पढ़ने आते थे। ऐसे नोटिस प्राप्त करने वाले सबसे ज्यादा 1,310 स्कूल इसी रायगढ़ वाले इलाके के थे जहां मैं गया था। इसके बाद र|ागिरी के 1,265 और पुणे के 1,031 स्कूल थे। सरकारी लिस्ट के आंकड़ों के हिसाब से ऐसे करीब 3,700 प्राइमरी, अपर प्राइमरी, और सेकंडरी स्कूल थे जहां 10 से भी कम बच्चे पढ़ने आ रहे थे।

इसी दौरान कुछ ग्राम पंचायतों ने तय किया कि क्यों न ऐसे स्कूलों उनमें लक्ष्मण जैसे निरक्षरों को पढ़ाया जाए ताकि उन्हें बंद होने से बचाया जा सकेगा। लेकिन, पता नहीं क्यों यह आइडिया हमारे देश के नीति-निर्धारकों को समझ में नहीं आया, शायद इसलिए कि हमारे देश में फ्री स्कूलिंग सिर्फ बच्चों को दी जाती है। लेकिन, इसी हफ्ते के शुरू में मैंने न्यूयॉर्क टाइम्स अखबार में एक आर्टिकल पढ़ा, जिसमें बताया गया था कि ऐसा ही एक आइडिया दक्षिण कोरिया में बड़ी अच्छी तरह से सफल हुआ। वहां पर भी स्कूलों के सामने ज्यादा बच्चों के दाखिले न होने की समस्या है, क्योंकि युवा पैरेंट्स अच्छी तनख्वाह वाली नौकरियों के लिए शहरों में शिफ्ट हो रहे हैं। ऐसे में खाली कक्षाओं को भरने के लिए एक स्कूल ने ऐसी बुजु्र्ग महिलाओं के लिए अपने दरवाजे खोल दिए, जो हमेशा पढ़ने का सपना देखा करती थीं। इस आर्टिकल में 70 वर्षीय बुजुर्ग दादी अम्मा वांग वोल-जियुम की कहानी बताई गई, जो गंजिम काउंटी गांव की उसी पीली बस में सवार होती है, जिसमें उनके परिवार के तीन अन्य सदस्य भी बैठते हैं और ये सदस्य केजी, तीसरी और 5वीं कक्षा में पढ़ रहे बच्चे हैं। स्कूल में उनके सहपाठियों में नाती-पोते और पड़पोते भी शामिल हैं।





फंडा यह है कि  कोरिया में हुए इस प्रयोग को हमारे देश में अपनाने में कुछ भी गलत नहीं होगा, जहां बड़ी संख्या में वरिष्ठ नागरिक अभी भी निरक्षर हैं।

एन. रघुरामन

मैनेजमेंट गुरु

[email protected]

एन. रघुरामन

मैनेजमेंट गुरु

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