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मुढ़ेना में नहीं जलाई जाती होली, न कोई फाग गाता है और न होता रासनृत्य

ग्राम मुढ़ेगा ही एक ऐसा गांव है जहां होली नहीं जलाई जाती, और न तो और हटरीबाजार भी यहां नहीं लगता। जिला मुख्यालय से...

Danik Bhaskar

Mar 02, 2018, 03:00 AM IST
ग्राम मुढ़ेगा ही एक ऐसा गांव है जहां होली नहीं जलाई जाती, और न तो और हटरीबाजार भी यहां नहीं लगता। जिला मुख्यालय से करीब 9 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है इस गांव में होली के मौके पर न तो कोई फाग गाता है और न ही रासनृत्य। कुंवारी गांव धारणा के कारण आज भी यहां होलिका दहन वर्जित है।

शौकिया तौर पर बच्चे गांव से बाहर जरूर नगाड़ा बजा लेते है लेकिन फुहड़ता का प्रदर्शन वहां भी वर्जित है। इस संबंध में ग्राम मुढ़ेना के बड़े बुजुर्गों का कहना है कि यह परंपरा हमारे पुरखों ने चला रखी है, जिनका पालन अभी तक यहां किया जा रहा है। संभव है कि इसके पीछे उनकी भावना कुछ और रही होगी लेकिन हमें सिर्फ यह बताया गया है कि गांव का ब्याह नहीं हुआ है, इसलिए यहां इनका चलन नहीं है।

सालों से परंपरा

मुढ़ैना गांव के पूर्व सरपंच गोविंद ठाकुर का कहना है कि गांव में होली के मौके पर होली नहीं जलाई जाती, यह परंपरा वर्षों से चली आ रही है। पहले गांव में मांग दुर्गाेत्सव का आयोजन नहीं किया जा रहा था, लेकिन अब यहां के उत्साही नौजवानों ने इस दिशा में पहल किया और किसी ने विरोध नहीं किया धीरे धीरे दुर्गोत्सव का आयोजन क्वांर माह प्रतिवर्ष होने लगा।

मुढ़ेना गांव की मुख्य गली, इस गांव में प्रतिबंधित है नगाड़ा बजाना।

भलेसर में नहीं किया गया होली दहन

मुख्यालय से महज 5 किमी दूर भलेसर में चिकनपॉक्स से 80 लोग ग्रसित थे। 7 माह की बच्ची से 35 वर्ष तक के लोगों को चिकन पॉक्स हो रहा है। हालात यह है कि बच्चे कई दिनों से स्कूल नहीं जा पा रहे थे। गुरुवार को गांव में पहुंची स्वास्थ्य विभाग की टीम ने सिर्फ खाना पूर्ति की और लौट आई। ग्राम विकास समिति ने बीमारी के प्रभाव को देखते हुए इस साल होनी नहीं मनाने का निर्णय लिया है।

अंधविश्वास से नहीं जोड़ना चाहिए

अंधविश्वास उन्मूलन के दिनेश शर्मा का कहना है कि इसे अंधविश्वास से ग्रामीणों को नहीं जोड़ना चाहिए, इस मौसम में ठंड जाने लगती है गर्मी आने लगती है, इस मौसम में संक्रमण की संभावना होती है। उस समय सामूहिक रूप से संक्रमण आया होगा लेकिन अब परिस्थिति बदल गई, होली को मनाना चाहिए। होली मेल जोल का त्योहार है।

होली में हुए नाच के बाद गांव में फैली थी महामारी

गांव के 85 वर्षीय राजेंद्र साहू बताते है कि कुंवारी गांव की मान्यता के कारण यहां बाजार भी नहीं लगता। घोड़ारी या आसपास के गांवों में लगने वाले हाट बाजार से ग्रामीण चलाते है। उन्होंने यह भी बताया कि उनकी उम्र 10-12 साल रही होगी तब यहां मालगुजार द्वारा होली के मौके पर नाच का आयोजन कराया गया था। उस समय गांव में भयंकर बीमारी फैल गई थी, उसके बाद से तो तौबा कर ली।

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