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आत्मचिंतन, स्वयं का निरीक्षण ही स्वाध्याय

भास्कर न्यूज | नवापारा राजिम श्वेतांबर जैन मंदिर में चल रहे चातुर्मास के तीसरे दिन शनिवार को आयोजित सत्संग में...

Bhaskar News Network | Last Modified - Jul 29, 2018, 03:06 AM IST

आत्मचिंतन, स्वयं का निरीक्षण ही स्वाध्याय
भास्कर न्यूज | नवापारा राजिम

श्वेतांबर जैन मंदिर में चल रहे चातुर्मास के तीसरे दिन शनिवार को आयोजित सत्संग में विनम्र सागर जी म सा कहा कि संसार में पूर्ण रूप से कोई सुखी नहीं है। धन दौलत, ऐशोआराम भोगने वाले भी सुखी नहीं हैं। इनमें व्याप्त सुख क्षणिक होता है, क्योंकि इसके जड़ में ज्ञान या चिंतन नहीं होता है। इसलिए हर मनुष्य के लिए स्वाध्याय आवश्यक है। मुनि श्री ने बताया कि स्वाध्याय स्वयं का अध्ययन, पठन ही है।

जीवन निर्वाह के लिए आवश्यक पढ़ाई एवं उससे प्राप्त डिग्री आवश्यक है। यह अध्ययन कहलाता है और स्वयं का अध्ययन अपनी आत्म का निरीक्षण, परीक्षण, समीक्षा एवं शुद्धिकरण ही स्वाध्याय है। यह जीवन के निर्वाह, निर्माण एवं निर्वाण सहायक होती है। इसमें किसी तरह की शंका और उसका गुरु भगवंत से समाधान करना पृच्छना, श्रवण करना परार्वतन अनुप्रेक्षा कहलाता है। चातुर्मास के प्रथम दिवस से ही साधकों द्वारा तपस्या प्रारंभ हो गई है। नीतू पारख के चार उपवास, प्रकाश गिड़िया तीन उपवास, चंद्रकला, आभा, कविता एवं स्वाति मोनित बंगानी के तीन उपवास की तपस्या की है। सभी तप साधकों का जैन श्री संघ ने आभार जताया है।

श्वेतांबर जैन मंदिर में तीसरे दिन आयोजित सत्संग में विनम्र सागर ने दिया प्रवचन

नवापारा राजिम. श्वेतांबर जैन मंदिर में चल रहे सत्संग में साधकों को व्याख्यान देते हुए विनम्र सागर मुनि।

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