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हाथी प्रभावित क्षेत्र में धीमी नहीं थी ट्रेन की रफ्तार, ड्राइवर चूकता तो जातीं सैकड़ों जानें

जहां पटरियों पर से हाथी गुजरते हैं वहां110 किमी प्रति घंटे की स्पीड से चलती है ट्रेन। भास्कर न्यूज | रायगढ़ “मैं...

Bhaskar News Network | Last Modified - Apr 17, 2018, 03:15 AM IST

हाथी प्रभावित क्षेत्र में धीमी नहीं थी ट्रेन की रफ्तार, ड्राइवर चूकता तो जातीं सैकड़ों जानें
जहां पटरियों पर से हाथी गुजरते हैं वहां110 किमी प्रति घंटे की स्पीड से चलती है ट्रेन।

भास्कर न्यूज | रायगढ़

“मैं और मेरा सहायक लोको पायलट यूबी बारिक हावड़ा-मुंबई मेल लेकर आ रहे थे। सोमवार की सुबह लगभग 3.30 धूतरा और बागीडीह स्टेशन से पहले कुछ हाथियों का झुंड ट्रैक पार कर रहा था। यहां ट्रैक थोड़ा घुमावदार है। 120 मीटर की दूरी से मुझे ट्रेन की लाइट में हाथी नजर आए, जिसके बाद मैने एमरजेंसी ब्रेक लगाया। ट्रेन की स्पीड 110 किलोमीटर प्रति घंटा थी। ट्रेन पूरी तरह से रूक पाती इससे पहले ही हाथियों के झुंड से टकरा गई। चारों हाथियों की मौत हो गई। ट्रेन की रफ्तार काफी धीमी हो गई थी। रफ्तार समय पर कंट्रोल न कर पाते तो भयानक हादसा हो सकता था। यह एरिया एलिफेंट जोन है। यहां कॉशन आर्डर के तौर पर लंबा हार्न बजाकर चलने को कहा गया है। हम लंबा हार्न बजाकर ही चलते हैं। घुमावदार रास्ता होने के हाथी मुझे काफी देर बाद दिखे। हादसे के बाद डाउन लाइन पर एक ट्रेन आ रही थी, जिस पर एक हाथी का शव पड़ा हुआ था, हमने सूचना देकर ट्रेन रुकवाई। हाथी की टक्कर के कारण इंजन में कुछ इंटरनल फॉल्ट आ गए थे। जिसे जामगांव में पहुंचकर इंजन चेंज किया।’’ जैसा लोको पायलट (ड्राइवर) एमसीएच खैरवार ने भास्कर को बताया।

हादसे के बाद क्रेन आपरेटर ने फूल चढ़ाकर पूजा की फिर हाथियों के शव को ट्रैक से हटाया

पिछले एक साल में 10 से अधिक हाथियों की मौत

पिछले एक साल के भीतर झारसुगुड़ा से रायगढ़ के बीच 10 से अधिक हाथियों की मौत रेल दुर्घटनाओं में हो चुकी है। जानकारी के मुताबिक झारसुगुड़ा के वन विभाग ने रेलवे को कई बार इस क्षेत्र में ट्रेनों की रफ्तार कम करने के लिए पत्र लिखा है लेकिन चक्रधरपुर डिवीजन ने इसपर ध्यान नहीं दिया। इसी कारण लगातार दुर्घटनाएं बढ़ते जा रही हैं। दुर्घटना होने के कुछ देर बाद तक नियमों का पालन के लिए कॉशन आर्डर जारी किए जाते हैं जिन पर कुछ दिनों तक ही अमल होता है।

इन परिस्थितियों में करते हैं इमरजेंसी ब्रेक का उपयोग

सीनियर लोको पायलट ने भास्कर को बताया कि फिलहाल यात्री ट्रेनों की अधिकतर स्पीड 110 ही है। 110 की रफ्तार में चलने के दौरान यदि कोई बाधा बीच में आ जाती है तो ड्राइवर प्रेशर ढीला कर ब्रेक मारते हैं। यदि स्थिति आपातकाल की है तो इमरजेंसी ब्रेक लगाया जाता है। एमरजेंसी ब्रेक मारने के बाद भी ट्रेन पूरी तरह खड़े होने तक 500 मीटर आगे निकल जाती है। इमरजेंसी ब्रेक का उपयोग ज्यादा नहीं किया जाता है, इससे ट्रेन के पटरी से उतरने का खतरा होता है।

ये कर सकते हैं उपाय

एलिफेंट जोन या फिर अन्य वन्यप्राणियों के क्षेत्र से गुजरते रेलवे ट्रैक में दुर्घटनाएं रोकने के लिए हर जोन ने अलग-अलग तरह के उपाय किए हैं। कुछ उपाय से हाथियों से होने वाली दुर्घटनाओं को रोका जा सकता है।

वनविभाग द्वारा चिन्हित हाथियों के आवागमन क्षेत्र में ट्रैक के किनारे बाड़े लगाए जाएं।

कॉशन आर्डर जारी कर ऐसे क्षेत्रों में स्पीड लिमिट को कम किया जाए।

रेलवे ट्रैक के किनारे खुदे गड्ढों को ढंक दें ताकि कोई जानवर न घुसे।

जामगांव से पहले इंजन में लगी आग

हाथी से टक्कर के बाद ट्रेन के बैटरी पैनल में खराबी आ गई थी। इसी कारण जामगांव पहुंचने से पहले ही इंजन से धुंआ निकलना शुरू हो गया था। जामगांव के पास जब ट्रेन रुकी तो उसमें आग की लपटें उठने लगीं। ड्राइवरों ने अग्नि शामक यंत्र से आग पर काबू पाया।

305 मीटर तक की रोशनी रात में

यात्री ट्रेनों में जो हेड लाइट लगी होती है उसकी रोशनी 305 मीटर तक के लिए पर्याप्त होती है। इसके अलावा जो मालगाड़ियों में लाइट होती है वह 105 मीटर तक के लिए होती है। जहां पटरी घुमावदार होती है वहां पर रोशनी की रेंज घट जाती है। यही आज के दुर्घटना में हुआ। ट्रैक घुमावदार होने के कारण ड्राइवर को रास्ता पूरी तरह से दिख नहीं पाया और एमरजेंसी ब्रेक मारने से पहले ही हाथियों से टक्कर हो गई।

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