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रोज 50 को काट रहे कुत्ते,3 साल में चार को मारा, नसबंदी के नाम पर 56 लाख फूंके

शहर में हिंसक हो चुके कुत्ते रोज 50 से ज्यादा लोगों को काट रहे हैं।

Danik Bhaskar | Jan 21, 2018, 07:50 AM IST

रायपुर. शहर में हिंसक हो चुके कुत्ते रोज 50 से ज्यादा लोगों को काट रहे हैं। अंबेडकर अस्पताल में ही रोजाना 50 लोग कुत्ते काटने का इंजेक्शन लगवाने पहुंचते हैं। इनमें आधे पुराने होते हैं, लेकिन प्राइवेट अस्पतालों में पहुंचने वाले पीड़ितों की संख्या मिलाने से आंकड़ा पचास के पार हो रहा है। इतना ही नहीं तीन साल में कुत्ते चार बच्चों को नोंचकर मार चुके हैं। कुछ इलाकों में कुत्ते दिन दहाड़े लोगों पर हमला करते हैं। इसके बावजूद निगम केवल नसबंदी के माध्यम से कुत्तों पर अंकुश लगाने की मुहिम चला रहा है। चार साल में 56 लाख फूंके जा चुके हैं। तीन महीने से तो नसंबदी अभियान भी बंद है।

- अनुपम नगर में 12 महीने के बच्ची की दर्दनाक मौत के बाद भास्कर ने कुत्ताें के खिलाफ चलाए जा रहे अभियान की समीक्षा की। पड़ताल के दौरान पता चला कि निगम न तो आवारा और पागल कुत्तों को पकड़ने का अभियान चला रहा है और न ही उनकी जनसंख्या रोकने की मुहिम ही चल रही है।

- इस तरह कुत्तों को लेकर शहरवासियों की हिफाजत का पूरा प्रोजेक्ट ही ठप पड़ा है। निगम ने कुत्तों की नसबंदी का ठेका सामाजिक संस्था को दिया था। पिछले चार साल से अलग-अलग चरणों में सामाजिक संस्था कुत्तों की नसबंदी कर रही है ताकि उनकी जनसंख्या कंट्रोल की जा सके।

- इस अवधि में कई बार अभियान बंद हुआ। अभी भी पिछले तीन महीने से अभियान बंद है। नगर निगम के पास स्ट्रीट डाग की कोई गणना नहीं है। फिर भी 10 हजार से ज्यादा आवारा कुत्ते होने का अनुमान है। निगम का दावा है कि पिछले चार सालों में उन्होंने 8 हजार कुत्तों की नसबंदी की जा चुकी है।

- नन्हीं बच्ची की मौत से दुखी परिजनों को पोस्टमार्टम के लिए 7 घंटे तक इंतजार करना पड़ा। बच्ची को सुबह 8 बजे मृत घोषित कर दिया गया था। उसके बाद भी बच्ची पोस्टमार्टम कर शव दोपहर बाद 3 बजे दिया गया।

- बच्ची के गमजदा माता पिता सुबह से ही पोस्टमार्टम होने के इंतजार में चीरघर के बाहर बैठे रहे। बार-बार उनकी आंखों से आंसू बह रहे थे। न तो कोई दिलासा देने वाला था और न ही कोई उनकी मदद करने आगे आ रहा था।

- उन्हें मालूम ही नहीं हो रहा था कि आखिर बच्ची के साथ क्या हो रहा है। सुबह से दोपहर तक वे बाहर बैठे थे। बीच बीच में पिता वहां मौजूद लोगों से पूछता था कि क्या हो रहा है? बच्ची कब मिलेगी, लेकिन हर कोई उसकी बात टाल रहा था। उसने चीरघर के बाद फाइल लेकर भटकर रहे पुलिस वालों से भी कहा कि मुझे बच्ची को लेकर बलौदाबाजार अपने गांव जाना है। जल्दी करवा दो। पर पुलिस वालों ने ये कहकर टाल दिया कि वे दूसरे थाने के केस में आए हैं।

- उन्हें नहीं मालूम कि उसकी बच्ची का केस कौन देख रहा है। सुबह 11 बजे ही बच्ची की मौत का मैसेज पूरे मीडिया में वायरल हो चुका था। उसके बाद भी पुलिस ने तेजी नहीं दिखायी। दोपहर ढाई बजे पंचनामा बनाकर पुलिस के जवान पहुंचे।

- पशु चिकित्सक डॉ. संजय जैन का कहना है कि इस समय कुत्तों का ब्रीडिंग सीजन है। यही कारण है कुत्ते हिंसक हो जाते हैं। कई कुत्ते बच्ची को देखकर काटने दौड़ते हैं और हिंसक हो जाते हैं। परिजनों को बच्चों को अतिरिक्त सावधानी बरतने की जरूरत है।

अभियान में खामी, इसलिए फेल
- कुत्तों का स्टरलाइजेशन सफल नहीं हो पा रहा है। निगम एक बार में दो से ढाई हजार कुत्तों की नसबंदी का टेंडर जारी करता है। टेंडर पूरा होने के बाद ठेका लेने वाली कंपनी काम बंद कर देती है और छह महीने से लेकर सालभर तक स्टरलाइजेशन बंद रहता है। इस दौरान कुत्तों का परिवार बढ़ जाता है। नए कुत्ते बड़े होकर फिर से आतंक फैलाने लगते हैं। दोषपूर्ण तरीके से चल रहे निगम के नसबंदी प्रोग्राम के कारण ही कुत्तों पर नियंत्रण नहीं हो पा रहा है।

अधूरा छोड़कर भागी कंपनी
- निगम ने पिछले साल ढाई हजार कुत्तों की नसबंदी के लिए महाराष्ट्र की एक कंपनी को ठेका दिया था। कंपनी ने करीब हजार कुत्तों की ही नसबंदी की गई थी कि रेट को लेकर निगम और कंपनी के बीच ठन गई। डेढ़ महीने पहले कंपनी काम समेटकर चली गई है। तब से अधिकृत रूप से स्टरलाइजेशन बंद पड़ा है। अफसरों का दावा है कि निगम के ही कर्मचारियों को ट्रेंड कर स्टरलाइजेशन किया जा रहा है। पिछले सालभर से निगम के कर्मचारी कुत्ते पकड़कर उनकी नसबंदी कर रहे हैं।


आंसू नहीं थम रहे माता-पिता के
- घटना के वक्त बच्ची का पिता बलौदाबाजार के लिए निकल चुका था। आधे रास्ते उन्हें इसकी खबर मिली और वह लौटा। तब तक पास-पड़ोस के लोग उसे अंबेडकर अस्पताल ले जा चुके थे। वहां डाक्टरों ने मृत घोषित कर दिया। इसके बाद बच्ची के शव को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया गया। उसके पिता और मां गंगा के साथ होरी लाल भी चीरघर के पास ही बैठा रहा। माता और पिता दोनों के आंसू थम नहीं रहे थे। बार-बार भाग्य को केस रहे थे।