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देश के लिए दशकों से अबूझ है अबूझमाड़, पढ़ने के लिए 20 Km दूर पैदल जाते हैं बच्चे

देश के लिए दशकों से अबूझ पहेली है छत्तीसगढ़ का अबूझमाड़।

Bhaskar News | Last Modified - Jan 22, 2018, 11:37 AM IST

देश के लिए दशकों से अबूझ है अबूझमाड़, पढ़ने के लिए 20 Km दूर पैदल जाते हैं बच्चे

रायपुर. देश के लिए दशकों से अबूझ पहेली है छत्तीसगढ़ का अबूझमाड़। यहां के 90% गांवोें को किसी बाहरी व्यक्ति ने कभी नहीं देखा है। कितने गांव, कितनी आबादी, कितने घर; सब अनुमान है। कहते हैं 5 हजार वर्ग किलोमीटर में फैले अबूझमाड़ इलाके में 206 गांव हैं। नारायणपुर जिले के 70% भाग में अबूझमाड़ आता है। एक तरफ बीजापुर और दूसरी तरफ महाराष्ट्र की सीमा है। इस अनदेखी दुनिया को देखने भास्कर टीम जटवर गांव पहुंची। इस गांव को भी पहले किसी बाहरी व्यक्ति ने नहीं देखा है।

पढ़ने के लिए ये रोज 20 किमी चल रहे बच्चे

आदिवासियों की छवि की तरह यहां अब लोग आधे कपड़ों में नहीं रहते। बच्चों ने फुलपेंट, बरमूडा, टी-शर्ट पहनना सीख लिया है, युवतियों ने सलवार-कुर्ती, लैगी को अपना लिया है। हालांकि, बिजली तो दूर यहां एक हैंडपंप तक नहीं है। लेकिन देश के सबसे दुरूह जंगल अबूझमाड़ में ज्ञान की रोशनी पहुंचने लगी है। बाहरी सीमा पर कुछ गांवों में स्कूल और आंगनवाड़ियां हैं। भीतर घने जंगलों के बीच बसे गांवों से बच्चे पैदल चलकर यहां पहुंच रहे हैं। इसके लिए उन्हें 10 किमी जाना और इतना ही वापस आना पड़ता है। यानी पढ़ने के लिए ये रोज 20 किमी चल रहे हैं।

यहां के लोगों ने खिलखिलाकर जीना सीख लिया

- जटवर नक्सलियों की मांद में बसा है। नारायणपुर से 41 किमी दूर। सरकारी सुविधाओं के नाम पर शून्य। चौबीसों घंटे सुरक्षा बलों और नक्सलियों में टकराव के बीच भी यहां के लोगों ने खिलखिलाकर जीना सीख लिया है। सुविधाएं, संपन्नता भले ही यहां नजर न आएं, लेकिन जिंदगी खुशनुमा बनने लगी है।

- मेहनतकश लोग पहाड़ों को काटकर धान पैदा कर रहे हैं। पीने का पानी अभी भी नदी, नालाें से ले रहे हैं, पर अब उसे छानना सीख चुके हैं। खुशहाली आई है तो दस-दस साल से बंद घोटुल यानी इनके बनाए पंचायत भवन भी खुल गए हैं। यहां दोपहर में बुजुर्ग और शाम को लड़के-लड़कियां नाच-गाकर खुशियां बांट रहे हैं।

- जब हम जटवर पहुंचे तो 33 परिवारों के इस गांव में उत्सव-सा माहौल था। युवक-युवतियां, बच्चे और बुजुर्ग सभी बाहर जाने की तैयारी में थे। पुरुषों के झोले में लड़ाकू मुर्गे थे, तो महिलाओं के हाथ में मिट्टी के बर्तन। न बर्तनों में भरी थी- सल्फी (बस्तर बीयर) और चावल से बना लांदा (एक तरह की शराब)।

- सबको पास के गांव कोहकामेटा पहुंचने की जल्दी है, क्योंकि आज वहां हाट का दिन है। रास्ता कितना कठिन है, इसकी परवाह नहीं। वहां सामान बेचेंगे तो पैसे मिलेंगे। लेकिन दिक्कत यह है कि इन्हें हिसाब नहीं आता। कोहकामेटा बाजार में परिवार के साथ आए उमो माड़िया ने सेठ को 3 छोटी बोरी धान दिया। सेठ ने उसे 220 रु. थमा दिए। उमो खुशी-खुशी चला गया। हिसाब पूछने की जरूरत ही नहीं समझी।

फोर्स के अलावा सिर्फ भास्कर पहुंचा

अबूझमाड़ में नक्सली मूवमेंट ऐसा है कि भास्कर टीम के साथ नारायणपुर से गए स्थानीय लोग सरहद से 15 किमी पहले छोड़कर चले गए। टीम ने प्रवेश कादुल से किया। पोंडापार होते हुए कोहकामेटा पहुंचे। कोहकामेटा धुर नक्सली इलाका है। यहां 15 दिन पहले ही नक्सलियों का कैंप लगा था। नदी पार करते देख बकरी चरा रहे बुजुर्ग ने चेताया- जटवर मत जाओ। लेकिन हम पहुंच गए। किसी को यकीन नहीं हो रहा था कि यहां कोई बाहरी व्यक्ति भी आ सकता है। कोहकामेटा से मुडेर और भंडारी गांव जाने की कोशिश की, लेकिन गांववालों ने जाने नहीं दिया।

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Web Title: desh ke liye dshkon se abujh hai abujhmaade, pdhene ke liye 20 Km dur paidl jaate hain bchche
(News in Hindi from Dainik Bhaskar)

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