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छत्तीसगढ़ के साहित्यकार श्यामलाल चतुर्वेदी और समाजसेवी दामोदर बापट को पद्मश्री

2018 में इन प्रतिष्ठित पुरस्कारों के लिए 15,700 से अधिक लोगों ने आवेदन किया था।

Dainik Bhaskar

Jan 26, 2018, 07:31 AM IST
साहित्यकार श्यामलाल चतुर्वेद साहित्यकार श्यामलाल चतुर्वेद

रायपुर/नई दिल्ली. गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर केंद्रीय गृहमंत्रालय ने पद्म विभूषण, पद्म भूषण और पद्मश्री पुरस्कारों की घोषणा कर दी। छत्तीसगढ़ के 2 लोगों को पद्मश्री पुरस्कार से नवाजा गया है। इसमें बिलासपुर के श्यामलाल चतुर्वेदी को साहित्य, शिक्षा व पत्रकारिता में उल्लेखनीय योगदान के लिए चुना गया है। जांजगीर-चांपा जिले के दामोदर गणेश बापट को समाज सेवा के लिए यह सम्मान दिया जा रहा है।

रोगियों को आत्म निर्भर भी बनाते हैं बापट

- 2018 में इन प्रतिष्ठित पुरस्कारों के लिए 15,700 से अधिक लोगों ने आवेदन किया था। 2017 में 89 लोगों को पद्म पुरस्कार दिए गए थे, जिनमें सात-सात पुरस्कार पद्म विभूषण और पद्म भूषण के थे। बापट करीब 80 साल के हैं। - उन्होंने करीब 45 साल पहले चांपा के पास सोंठी में एक आश्रम बनाया था। यहां कुष्ठ रोगियों को रखा जाता है। बापट व उनके सहयोगी कुष्ठ मरीजों की सेवा करते हैं। उनकी दवा, रहने व खाने का इंतजाम भी यहीं होता है। चांपा के सोंठी के पात्रे नगर का यह आश्रम आर्थिक जनसहयोग से चलता है। बापट रोगियों को आत्म निर्भर भी बनाते हैं।

रचनाओं में ‘बेटी के बिदा’ प्रसिद्ध रचना

- छत्तीसगढ़ी के साहित्यकार और कवि, पत्रकार श्यामलाल चतुर्वेदी वे व्यक्ति हैं जो रायपुर-बिलासपुर करीब 114 किलोमीटर साइकिल से आना-जना करते थे। ये उनकी सादगी थी। वे जनसत्ता और नवभारत टाइम्स के प्रतिनिधि रहे। 1940-41 से लेखन आरंभ किया। शुरूआत हिन्दी में की लेकिन ‘विप्र’ जी की प्रेरणा से छत्तीसगढ़ी में लेखन शुरू किया। चतुर्वेदी शिक्षक भी थे।

- उनका कहानी संग्रह ‘भोलवा भोलाराम’ भी प्रकाशित हुआ। चतुर्वेदी का जन्म 1926 में बिलासपुर जिले के गांव कोटमी में हुआ था। वे छत्तीसगढ़ी के गीतकार भी हैं। उनकी रचनाओं में ‘बेटी के बिदा’ प्रसिद्ध रचना है। उन्हें ‘बेटी के बिदा’ के कवि के रुप में लोग पहचानते हैं। बचपन में मां के कारण उनका रुझान लेखन में हुआ। उनकी मां ने उन्हें सुन्दरलाल शर्मा की ‘दानलीला’ रटा दी थी।

कहीं जाने से परहेज नहीं रहा

- वे कहते हैं कि छत्तीसगढ़ी साहित्य के मूल, छत्तीसगढ़ की मिट्टी, वहां के लोकगीत, लोक साहित्य है। चतुर्वेदी की ‘जब आइस बादर करिया’ जमीन से जुड़ी हुई है। पत्रकारिता और साहित्य की दुनिया में छत्तीसगढ़ की वे एक बड़ी पहचान हैं। निरंतर लेखन, व्याख्यानों, प्रवासों से उन्होंने इसे समृद्ध किया है। इस अर्थ में वे एक यायावर भी हैं, जिन्हें कहीं जाने से परहेज नहीं रहा। वे एक राष्ट्रवादी चिंतक हैं। किंतु विचारधारा का आग्रह उनके लिए बाड़ नहीं है। वे हर विचार और राजनीतिक दल के कार्यकर्ता के बीच समान रूप से सम्मानित हैं।

- मध्यप्रदेश के कई मुख्यमंत्रियों से उनके निकट संपर्क रहे हैं। मंत्रियों की मित्रता सूची में उनकी अनिवार्य उपस्थिति है। किंतु खरी-खरी कहने की शैली ने सत्ता के निकट रहते हुए भी उनकी चादर मैली नहीं होने दी। सही मायनों में वे रिश्तों को जीने वाले व्यक्ति हैं, जो किसी भी हालात में अपनों के साथ होते हैं।

सच कहने का साहस और सलीका
पं. चतुर्वेदी में सच कहने का साहस और सलीका दोनों मौजूद है। वे कहते हैं तो बात समझ में आती है। कड़ी से कड़ी बात वे व्यंग्य में कह जाते हैं। सत्ता का खौफ उनमें कभी नहीं रहा। इस जमीन पर आने वाले हर नायक ने उनकी बात को ध्यान से सुना और उन्हें सम्मान भी दिया। सत्ता के साथ रहकर भी नीर-क्षीर-विवेक से स्थितियों की व्याख्या उनका गुण है। वे किसी भी हालात में संवाद बंद नहीं करते। व्यंग्य की उनकी शक्ति अप्रतिम है। वे किसी को भी सुना सकते हैं और चुप कर सकते हैं। उनकी याददाश्त बिलकुल तरोताजा है। स्मृति के संसार में वे हमें बहुत मोहक अंदाज में ले जाते हैं। उनकी वर्णन कला गजब है। वे कहते हैं तो दृश्य सामने होता है। सत्य को सुंदरता से व्यक्त करना उनसे सीखा जा सकता है। वे अप्रिय सत्य न बोलने की कला जानते हैं।

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