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नक्सली इलाकों में बमों को डिटेक्ट करने के लिए जवानों के पास आधुनिक उपकरण नहीं

किस्टाराम में बम मेटल डिटेक्टर में क्यों कैद नहीं हो पाया, इसकी विस्तृत जांच करवाई जा रही है।

​मोहम्मद इमरान नेवी| Last Modified - Mar 15, 2018, 05:55 AM IST

Dainik Bhaskar Investigation on Sukma Naxal Attack
नक्सली इलाकों में बमों को डिटेक्ट करने के लिए जवानों के पास आधुनिक उपकरण नहीं

जगदलपुर.   मंगलवार की सुबह किस्टाराम कैंप से तीन किमी आगे नक्सलियों ने बारूदी सुरंग विस्फोट कर एक एमपीवी( माइन प्रोटेक्टेड वीकल) को उड़ा दिया। जिस स्थान पर एमपीवी को उड़ाया गया है वहां पुलिया निर्माण के लिए रोड डायवर्ट किया गया था। जवान यहां लगातार सर्चिंग कर रहे थे और मेटल डिटेक्टर से सुरंग का पता लगाने की कोशिश भी कर रहे थे लेकिन इसके बाद भी बम ब्लास्ट हो गया।

 

सवाल उठ रहे हैं कि लगातार सर्चिंग के बाद भी जमीन के नीचे बारूद कैसे दबा रह गया। जब भास्कर की टीम ने इस मामले में पड़ताल शुरू की तो चौंकाने वाले तथ्य सामने आए। दरअसल नक्सलियों व्दारा दबाया गया बारूद प्लास्टिक कंटेनर में पैक होता है जो मेटल डिटेक्टर की पकड़ में नहीं आता। यानी इन कंटेनरों की छानबीन का तरीका जवानों के पास भी नहीं है जिससे उन्हें जान का नुकसान उठाना पड़ रहा है। 


अलग-अलग सुरक्षाबलों के अफसरों से जब इस संबंध में पूछताछ शुरू की गई तो पता चला कि जवानों को जमीन के अंदर दफन किए गए बमों को ढूंढने के लिए साधारण मेटल डिटेक्टर दिए गए हैं। यही स्थिति बम स्क्वाड की भी है। इनके पास भी बम ढूंढने के लिए सिर्फ मेटल डिटेक्टर ही हैं। जवान सिर्फ उन्हीं बमों को ढूंढ पा रहे हैं जिनकी पैकेजिंग मेटल में की गई है। नक्सलियों को भी जवानों को बम ढूंढने के लिए मिले उपकरणों की जानकारी है, इसलिए उन्होंने बम बनाने और इसे लगाने का तरीका ही बदल दिया और नक्सलियों के इस नए तरीके से जवान मात खा रहे हैं। नक्सली अब बारूद को पैक करने के लिए प्लास्टिक के कंटेनर का इस्तेमाल कर रहे हैं। 


बारूद की क्षमता बढ़ाने के लिए मेटल के डिब्बों के बदले प्लास्टिक कंटेनर में इसे ठूंसकर भरा जा रहा है। प्लास्टिक का कंटेनर का उपयोग करने से इसके फटने की क्षमता में कोई फर्क नहीं पड़ रहा है और यह मेटल के डिब्बे के बराबर ही नुकसान कर रहा है। इसके अलावा जवानों के पास मौजूद डिटेक्टर में यह पकड़ में भी नहीं आ रहा है। ऐसा माना जा रहा है कि किस्टाराम में भी नक्सलियों ने ऐसा ही कोई नया प्रयोग किया, जिसके चलते डायवर्ट रूट के नीचे दबा बम जवानों की नजर से बच गया।  

 

नारायणपुर में सड़क खोदकर बरामद किया था प्लास्टिक का कंटेनर 


नारायणपुर की मुख्य सड़क पर नक्सलियों ने कुछ समय पहले प्लास्टिक के कंटेनर वाला बम लगाया था। जब नक्सली यह बम लगा रहे थे उस दौरान पुलिस के एक मुखबिर ने इसे देख लिया था। नक्सलियों ने बम लगाने के बाद सड़क को समतल कर दिया। इसके दूसरे दिन ही पुलिस यहां पहुंची और मेटल डिटेक्टर से खोजबीन शुरू की तो सड़क पर कुछ नहीं मिला। चूंकि मुखबिर ने नक्सलियों को बम लगाते खुद देखा था ऐसे में दो किमी सड़क की खुदाई करवाई गई तब कहीं जाकर जवानों को प्लास्टिक कंटेनर में भरा बारूद मिला। इसके बाद ही इस बात का खुलासा हो गया था कि नक्सली बम लगाने के लिए अपनी रणनीति बदल रहे हैं। हालांकि फोर्स ने बम ढूंढने के लिए कोई नई तकनीक नहीं अपनाई है।  

 

 

किस्टाराम में कैसे ब्लास्ट किया पुणे के आईईडी स्कूल में होगी जांच 


इधर किस्टाराम में बम मेटल डिटेक्टर में क्यों कैद नहीं हो पाया, इसकी विस्तृत जांच करवाई जा रही है। घटना के दूसरे दिन ब्लास्टिक एक्सपर्ट मौके पर पहुंचे थे और यहां से उन्होंने कई नमूने बरामद किये हैं। इन नमूनों को पुणे के आईईडी स्कूल भेजा जा रहा है। वहां से रिपोर्ट आने के बाद इस बात का खुलासा हो जाएगा कि नक्सलियों ने कौन से कंटेनर में बारूद भरा था।  


डीआईजी ने भी माना-प्लास्टिक के कंटेनर का इस्तेमाल कर रहे  


इधर डीआईजी पी सुंदरराज ने बताया कि नक्सलियों ने मेटल की जगह प्लास्टिक के डिब्बे, जो चावल भरने या अन्य कामों के लिए उपयोग में लाए जाते हैं, का उपयोग बारूद भरने के लिए कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि मेटल के डिब्बे डिटेक्टर में कैद हो जाते हैं लेकिन नक्सलियों ने इसका तोड़ निकाल लिया  है। किस्टाराम के मामले में उनका कहना था कि ब्लास्ट के बाद ब्लास्टिक जांच करवाई जा रही है। इसकी रिपोर्ट आने के बाद ही कुछ कहा जा सकेगा।

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