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सुकमा से ग्राउंड रिपोर्ट : थानों की ऐसी किलेबंदी कि रिपोर्ट लिखाने से घबराते हैं लोग

किस्टाराम हमले के बाद भास्कर टीम उन इलाकों में पहुंची जहां नक्सलियों का घोर आतंक है।

dainikbhaskar.com | Last Modified - Mar 24, 2018, 01:45 PM IST

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    थानों के बाहर ऑटोमैटिक हथियारों से लैस जवान पहरा देते हुए।

    रायपुर।सुकमा के घोर नक्सल प्रभावित किस्टाराम में 13 मार्च को हुए नक्सली हमले के बाद दैनिक भास्कर की टीम इन इलाकों में पहुंची। टीम ने देखा कि यहां नक्सलियों के चलते थानों की किलेबंदी की गई थी। बताया गया कि थानेदार से मिलने से पहले सीआरपीएफ के अधिकारियों से मिलना होता है। गेट पर ऑटोमैटिक हथियार लिए सीआरपीएफ के जवान तैनात थे। जानकारी मिली कि थानों की ऐसी किलेबंदी के चलते यहां ज्यादातर लोग रिपोर्ट लिखवाने ही नहीं आते हैं। पुलिसकर्मी थाने के भीतर ही रहते हैं।

    - भास्कर टीम ने करीब 400 किमी का सफर कर देश के सर्वाधिक नक्सल प्रभावित सुकमा जिले के आधा दर्जन थानों का जायजा लिया। सुकमा जिले के ज्यादातर थाने सुरक्षा कारणों से सीआरपीएफ कैंपों से घेर दिए गए हैं। सबकी संरचना लगभग एक सी है।

    - बाउंड्रीवॉल से काफी भीतर थाना भवन। बाउंड्री और पूरे कैंपस में चौकसी। सीआरपीएफ कमांडो मुस्तैद। दो-तीन थानों में पुलिसवालों से बात की तो उन्होंने बताया कि थाने से बाहर भी निकले तो चार-पांच के साथ और सबके पास हथियार जरूरी। क्योंकि पुलिसवाले ही दबी जुबान में मानते हैं कि प्रिडिक्ट नहीं कर सकते कि क्या हो जाएगा।

    - पूरे जिले में 18 थाने हैं, जिनमें एक थाना शहर में आैर शेष 17 जंगलों में एर्राबोर, गादीरास, भेज्जी, पोलमपल्ली, चिंतागुफा, चिंतलनार, जगरगुंडा, मरईगुड़ा, किस्टाराम आैर गोलापल्ली जैसे थानों में सीआरपीएफ के शिविर भी हैं। यानी पूरा थाना लगभग एक हजार प्रशिक्षित लड़ाकों के घेरे में।

    - जानकारों ने बताया कि पांच साल पहले तक कई थाने स्वतंत्र थे, लेकिन जब से खतरा बढ़ा है, तब से थाना के कैंपस में ही सुरक्षा आैर अर्धसैनिक बलों के कैंप अटैच कर दिए गए हैं। हर थाने की ऐसे मोर्चेबंदी कि परिंदा भी पर न मार सके।

    अर्धसैनिक बल से घिरा मरईगुड़ा थाना


    - राजधानी से करीब 550 किमी दूर सुकमा का मरईगुड़ा थाना। पूरा इलाका धुर नक्सल प्रभावित। भास्कर टीम थाने पहुंची तो बाहर ऑटोमेटिक गन लेकर तैनात सुरक्षाबलों ने गेट पर रोक दिया। एक जवान संदेश लेकर भीतर गया। करीब 5 मिनट बाद आकर बताया कि कुछ देर में बुलाएंगे। टीम भीतर गई तो मुलाकात थानेदार नहीं बल्कि सीआरपीएफ अफसर से करवाई गई। वहीं बताया गया कि सुरक्षाबलों के कैंप से लगा हुआ थाना है। टीम इसी कैंपस में स्थित थाने में पहुंची, लेकिन वहां बाहर कोई नहीं था। वहां खड़े फोर्स के जवान ने बताया कि थानेदार नहीं है, स्टाफ आमतौर से भीतर ही रहता है।


    एर्राबोर...ऐसे सवाल कि कोई थाने न जाए


    - सुकमा जिले में ही कोंटा हाईवे पर धुर नक्सल प्रभावित एर्राबोर थाना है। रोड पर थाने के सामने मालवाहनों की चेकिंग के लिए बड़ा बैरियर है। यहां से करीब 500 मीटर भीतर है थाना एर्राबोर।

    - बड़े परिसर में नया भवन बना है। नीचे थाना, ऊपर स्टाफ क्वार्टर। मुख्य द्वार पर अर्धसैनिक बलों के गनधारी जवान। उनके सवालों का जवाब देना कठिन है। वहां लगा कि ऐसे में तो फरियादी कम ही आते होंगे। भास्कर टीम थाने के भीतर पहुंची। थोड़ी देर बाद थानेदार आए और उन्होंने भी यही बताया कि बहुत कम लोग शिकायतें लेकर आते हैं। कोई आ भी गए तो आपस में सुलह करवा दी जाती है।

    रिपोर्ट और फोटो : कौशल स्वर्णबेर/प्रमोद साहू

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    सीआरपीएफ के जवानों के बीच घिरा है थाना।
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    नक्सल प्रभावित इलाकों में थाने की ऐसी किलेबंदी है कि परिंदा भी पर नहीं मार सकता।
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    इन इलाकों की धूल भरी सड़कों पर बाइक पर गस्त लगाते हैं जवान।
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