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यहां ताड़ के पत्तों से जलाई जाती है होली, 600 सालों से चली आ रही यह परंपरा

प्रकृति से जोड़ती दंतेवाड़ा की यह होली, उसे बचाने का संदेश भी देती है।

Dainik Bhaskar

Mar 02, 2018, 12:51 AM IST
natural holi celebrated in dantewada of cg state

दंतेवाड़ा (छत्तीसगढ़). प्रकृति से जोड़ती दंतेवाड़ा की यह होली, उसे बचाने का संदेश भी देती है। दरअसल, यहां दंतेश्वरी शक्तिपीठ है यहां इस तरह की विशेष तरह से होलिका दहन किया जाता है। 600 साल से यहां लकड़ी नहीं, ताड़ के पत्तों से होली जलाने की परंपरा चली आ रही है। होलिका दहन के बाद लोग एक दूसरे को टेसू और मिट्‌टी के घाेल से तिलक करते हैं। 600 साल से भी ज्यादा पुरानी परंपरा...

- शक्तिपीठ दंतेश्वरी की विशेष होलिका सजाने के लिए लकड़ियों का नहीं, बल्कि ताड़ के पत्तों का आज भी इस्तेमाल किया जाता। यह रस्म फागुन मेले में गुरुवार की शाम भी निभाई गई।

- होली जलाने में उपयोग किये जाने वाले ताड़ के पत्तों का आकार करीब एक मीटर लंबा-चौड़ा होता है। फागुन मेले के पहले दिन होने वाले ताड़ पलंगा धोनी की रस्म का नामकरण भी इसी से पड़ा।

- ताड़ के पत्तों को विधि-विधान के साथ दंतेश्वरी सरोवर में धोकर रख लिया जाता है, जिसे होलिका दहन के दिन इस्तेमाल करते हैं।

- शनि मंदिर के पास सती शिला के पास ही होलिका दहन करने की परंपरा है।

- होलिका दहन के बाद पुजारी और मंदिर के सेवादार, मांझी-मुखिया, कतियार, चालकी, तुड़पा, समरथ, पड़ियार, पटेल और जन सामान्य ने होलिका की परिक्रमा करते हैं।

- इसके बाद ताड़ के पत्तों की राख से एक-दूसरे के माथे पर तिलक किया गया। पुजारी के मुताबिक, यह परंपरा 600 साल से भी ज्यादा पुरानी है।

होलिका के भीतर बैठकर करते हैं पूजा
- इस होलिका दहन की खास बात यह है कि दंतेश्वरी मंदिर के पुजारी होलिका दहन से पहले होलिका के भीतर खाली जगह में बैठकर विशेष अनुष्ठान करते हैं। इसके बाद ही होलिका की परिक्रमा कर अग्नि दी जाती है। गुरुवार की शाम फागुन मेले में देवी की नवमी पालकी निकाली गई।

- पालकी के नारायण मंदिर से वापसी के बाद जयस्तंभ चौक पर आंवरामार की रस्म हुई, जिसमें पुजारी व सेवादारों ने अलग-अलग समूहों में बंटकर एक-दूसरे पर आंवले के फल से प्रहार किया।आंवले की मार पड़ने को शुभ माना जाता है।

मिट्‌टी और टेसू के घोल से तिलक तकचे गैं
- होलिका दहन की अगली सुबह शुक्रवार को रंग-भंग की रस्म में शक्तिपीठ के सामने मटके में मिट्‌टी व टेसू के फूलों से तैयार गाढ़ा घोल से लोग एक-दूसरे के माथे पर तिलक लगाएंगे। इसके बाद बाजे-गाजे के साथ नाचते-गाते होलिका दहन स्थल पहुंचकर होलिका की राख एकत्र कर तिलक करेंगे। होलिका दहन स्थल के बाद मेंडका डोबरा मैदान और मंदिर के सामने सभी लोग एक-दूसरे का हाथ थामे परिक्रमा करेंगे।

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