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150 साल पहले यहां सबसे ज्यादा थे कड़कनाथ, अब जंगल में छोड़े जाएंगे 500 चूजे

Bhaskar News | Last Modified - Feb 08, 2018, 08:00 AM IST

केंद्र के वैज्ञानिक कड़कनाथ के 500 चूजों को प्रयोग के तौर पर दंतेवाड़ा के जंगलों में छोड़ेंगे।
150 साल पहले यहां सबसे ज्यादा थे कड़कनाथ, अब जंगल में छोड़े जाएंगे 500 चूजे

दंतेवाड़ा(छत्तीसगढ़).दंतेवाड़ा के जंगलों में करीब 150 साल पहले बहुतायत में पाई जाने वाली कड़कनाथ मुर्गे की दुर्लभ प्रजाति अब फिर से जंगलों में देखी जा सकेगी। मुर्गे की इस नस्ल की विलुप्त प्रजाति को कृत्रिम के साथ-साथ प्राकृतिक आवास में रखने की तैयारी कृषि विज्ञान केंद्र ने कर रखी है। केंद्र के वैज्ञानिक कड़कनाथ के 500 चूजों को प्रयोग के तौर पर दंतेवाड़ा के जंगलों में छोड़ेंगे। इसी के आधार पर कड़कनाथ के अनुकूल 150 साल पूर्व व अब जलवायु में हुए बदलाव का भी पता वैज्ञानिक लगाएंगे। जंगलों में छोड़े जाने वाले इन 500 चूजों के भी संरक्षण का पूरा ख्याल रखा जाएगा। इसके लिए वैज्ञानिक वन विभाग के साथ-साथ स्थानीय ग्रामीणों की भी मदद ली जाएगी।

दो साल के रिसर्च में पाया दंतेवाड़ा में 150 साल पहले थी यह प्रजाति

केवीके के वैज्ञानिकों का दावा है कि दंतेवाड़ा में कड़कनाथ नस्ल के मुर्गों की प्रजाति, इसकी विलुप्ति, इसके लिए जलवायु की अनुकूलता ऐसी तमाम सारी चीजों पर केंद्र के वैज्ञानिकों ने लगातार दो साल तक रिसर्च किया। वैज्ञानिकों ने इसी रिसर्च में पाया कि कड़कनाथ की यह ब्रीड दंतेवाड़ा, सुकमा व बीजापुर के जंगलों में 150 साल पहले बहुतायत में पाई जाती थी। इसके बाद इस नस्ल के मुर्गे विलुप्त हो गए।

एकाएक बढ़ा उत्पादन
दंतेवाड़ा में कृत्रिम आवासों में कड़कनाथ चूजों को रखकर इसका उत्पादन किया जा रहा है। बेहद कम अवधि में एकाएक बढ़े उत्पादन से स्वयं वैज्ञानिक भी अचंभित हैं। कोशिश की जा रही है कि फार्मिंग के साथ-साथ जंगल में भी यह पक्षी आसानी से फिर से देखने को मिल सके।

ब्रीडिंग के बाद अब प्राकृितक वातावरण देने की कोशिश
कृषि विज्ञान केंद्र के वरिष्ठ वैज्ञानिक डाॅ. नारायण साहू ने बताया कि दो साल के रिसर्च में पाया है कि दंतेवाड़ा में 150 साल पुरानी ब्रीड है। अब कड़कनाथ को प्राकृतिक आवास देने की भी तैयारी की जा रही है। विलुप्त प्रजाति को फिर से जीवित करने का यह एक प्रयास रहेगा। इससे यह पता लगाया जा सकेगा कि प्राकृतिक वातावरण में सामंजस्य करने की क्षमता रखते हैं या नहीं। इनके संरक्षण के लिए वन विभाग को पत्र लिखा जाएगा। इन्हें नुकसान पहुंचाने वालों के लिए हर्जाना वसूलने की नीति भी प्रशासन से चर्चा कर स्थानीय स्तर पर बनाई जाएगी।

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Web Title: 150 saal pehle yaha sabse jyada the kdeknaath, ab jngal mein chhodee jaaengae 500 chuje
(News in Hindi from Dainik Bhaskar)

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