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स्टूडेट से वापस ले ली जाएंगी किताबें, उसी क्लास में आने वाले दूसरे को दी जाएंगी

ोच ये है कि ऐसी किताबों का दूसरे या तीसरे साल भी उपयोग हो जाएगा तो नई किताबें नहीं छापनी पड़ेंगी।

Dainik Bhaskar

Feb 07, 2018, 08:25 AM IST
सिम्बॉलिक इमेज। सिम्बॉलिक इमेज।

रायपुर. नई कक्षाओं में जाने वाले बच्चे चाहेंगे तो वे पुरानी किताबों से भी पढ़ाई कर पाएंगे। अर्थात, छात्र जिस कक्षा में जाएगा, उसके सीनियरों की पुरानी किताबें उनके लिए उपलब्ध रहेंगी। यह योजना किसी स्कूल या समूह के लिए नहीं, बल्कि सरकार पूरे प्रदेश के लिए लागू करने जा रही है। छत्तीसगढ़ बोर्ड के स्कूलों में हर छात्र को किताबें शासन से निशुल्क दी जा रही हैं। सोच ये है कि ऐसी किताबों का दूसरे या तीसरे साल भी उपयोग हो जाएगा तो नई किताबें नहीं छापनी पड़ेंगी। इससे किताब छापने का बड़ा खर्च भी बचेगा।

फिलहाल मुंगेली और बेमेतरा में पायलट प्रोजेक्ट के रूप में यह योजना लागू की गई है। वहां फार्मूला कामयाब रहा तो आने वाले साल में यही राज्यभर के स्कूलों में लागू कर दिया जाएगा। राज्य बोर्ड से संबद्ध स्कूलों में पहली से दसवीं तक मुफ्त किताबें देने का सिस्टम है। हर साल किताबों की छपाई पर सौ करोड़ों खर्च होते हैं।

शिक्षा सत्र 2016-17 में पहली से दसवीं तक की मुफ्त किताबों की छपाई पर 137 करोड़ रुपए खर्च हुए। अब एक बार छपी किताब का उपयोग दो या तीन साल तक करने की योजना है। ऐसा होने पर छपाई पर हर साल करोड़ों रुपए खर्च नहीं होंगे। यह खर्च दो या तीन साल के अंतराल पर होगा। मुंगेली व बेमेतरा के स्कूलों से इसकी शुरुआत हुई है।


इस साल यहां विभिन्न कक्षाओं में पास करने वाले विद्यार्थियों से स्कूल किताबें वापस लेंगे। फिर जब नया शिक्षा सत्र शुरू होगा और बच्चे वापस आएंगे तो उन्हें यही किताबें पढ़ने के लिए देंगे। अफसरों का कहना है कि दो-तीन साल तक इस योजना के तहत काम होगा। सीनियर बच्चों से किताबें ली जाएंगी और जूनियर को दी जाएंगी। इसमें देखा जाएगा कि कहां और क्या दिक्कत आ रही है। इसे लेकर बच्चों को पहले ही सूचना दे दी गई है। दो बरसों में इस बात का पता भी चल जाएगा कि कहां दिक्कत आ रही है। इसके आधार पर फिर सुधार होगा।

सीएम को जगदलपुर के शिक्षक ने दिया था सुझाव

स्कूल शिक्षा विभाग के सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक जगदलपुर के सरकारी स्कूल में पढ़ाने वाले एक शिक्षक डॉ. प्रमोद शुक्ला और कुछ अन्य ने शासन का ध्यान इस ओर दिलाया। उन्होंने मुख्यमंत्री जनदर्शन में आवेदन किया। जिसमें उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि हर साल नए सत्र में बच्चों को नई-नई किताबें बांटी जा रही हैं। इसकी छपाई पर काफी पैसा खर्च हो रहा है। एक साल के बाद यह बेकार हो जाती है। प्राय: यह देखा गया है कि घर में कचरा फेंकने, रद्दी या अन्य जगहों पर पुरानी किताबें मिलती हैं। इसलिए ऐसी कोई व्यवस्था होनी चाहिए जिसमें शिक्षा सत्र खत्म होने के बाद बच्चों से किताबें वापस ली जाए और फिर दूसरे बच्चों को यही किताब दी जाए। इसके बाद स्कूल शिक्षा विभाग में बैठकें हुई। इनके सुझाव को गंभीरता से लिया गया।

एक कक्षा के बाद बेच दी जाती है रद्दी में
राज्य बोर्ड से जुड़े सरकारी और प्राइवेट स्कूलों को कक्षा पहली से लेकर दसवीं तक मुफ्त किताबें बांटी जाती हैं। पिछले कई बरसों से इसी सिस्टम के तहत यहां पढ़ाई हो रही है। शिक्षा सत्र 2016-17 में करीब साठ लाख बच्चों को मुफ्त किताबें दी गई। करीब 2.85 करोड़ किताबें बांटी गई। हर साल यह आंकड़ा कुछ ऐसा ही रहता है। छपाई पर करोड़ों रुपए खर्च होने के बाद इसका इस्तेमाल सिर्फ एक कक्षा तक ही रहता है। इसके बाद इन किताबों का उपयोग नहीं होता। कई बार यह देखने में आया है कि यह किताबें रद्दी में बेची गई।

डीपीआई को सोच विचार कर प्रस्ताव देने के दिए गए हैं निर्देश

^ डीपीआई को सोच विचार कर प्रस्ताव देने के निर्देश दिए गए हैं। ऐसी किताबें जिनमें कोई बदलाव नहीं है, स्कूलों में वापस जमा कराई जाएंगी।''-विकासशील, सचिव, स्कूल शिक्षा

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