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स्वामी निश्चलानंद पर बिफरे शंकराचार्य स्वरूपानंद- उनके कारण ही रामलला आज तंबू में

श्रीराम मंदिर निर्माण के मसले पर दो शंकराचार्यों के बीच अब टकराव की स्थिति बन चुकी है।

Dainik Bhaskar

Feb 08, 2018, 08:15 AM IST
स्वामी निश्चलानंद को शंकराचा स्वामी निश्चलानंद को शंकराचा

रायपुर. श्रीराम मंदिर निर्माण के मसले पर दो शंकराचार्यों के बीच अब टकराव की स्थिति बन चुकी है। गोवर्धन मठ पुरी के शंकराचार्य निश्चलानंद सरस्वती के उस बयान पर शारदा व ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती बिफर गए, जिसमें उन्होंने कहा था कि अयोध्या में श्रीराम मंदिर और मस्जिद दोनों बनाने के लिए उन्हें छोड़कर सभी शंकराचार्यों व वैष्णवाचार्यों ने हस्ताक्षर किए थे। उनके हस्ताक्षर नहीं करने के कारण ही रामलला आज तंबू में हैं। स्वरूपानंद सरस्वती ने पुरी शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती पर गंभीर सवाल उठाए कि हिन्दू समाज से जुड़े इस मसले पर उन्होंने किया ही क्या है?

द्वारका शारदा मठ और ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती ने इस मुद्दे पर रायपुर स्थित शंकराचार्य आश्रम में दैनिक भास्कर से विशेष बातचीत की। आप भी पढ़िए अदालत में फिलहाल सुनवाई के लिए चल रहे इस चर्चित मसले पर उन्होंने क्या कहा...
“जब नरसिम्हा राव प्रधानमंत्री थे, तब उपद्रव के बाद जन्मभूमि की कुल 67 एकड़ जमीन अधिग्रहित कर ली गई। उन्होंने सार्वजिनक घोषणा की, कि अब ये भूमि सरकारी संपत्ति हो चुकी है। अगर हिन्दू धर्माचार्य मांगेंगे, तो उन्हें मंदिर बनाने के लिए इसे दे सकते हैं। ये दो जगह उन्होंने घोषणा की, जिसमें एक गोरखपुर थी। शृंगेरी मठ में चतुष्पीठ सम्मेलन हुआ। उस सम्मेलन में शृंगेरी के शंकराचार्य भारती तीर्थ जी, पुरी के निश्चलानंद स्वामी और द्वारका और ज्योतिर्मठ की तरफ से हम शामिल हुए। कांची के शंकराचार्य भी मौजूद थे। हम लोगों ने सरकार से मांग की, कि रामालय बनाने के लिए रामजन्मभूमि दी जाए। उसमें हमारे द्वारका और ज्योतिष पीठ की तरफ से दस्तखत हैं। शृंगेरी वाले शंकराचार्य के दस्तखत हैं और स्वामी निश्चलानंद जी के भी दस्तखत हैं।


शृंगेरी में प्रकाशित एक अंग्रेजी पत्रिका में दस्तखत के साथ प्रस्ताव छपा भी था। ये कोई मनगढ़ंत बात नहीं है। जब हम लोगों ने ये मांग की, तो प्रधानमंत्री के यहां से हमें ये संदेश दिया गया कि आप एक ट्रस्ट बनाइए, ताकि हम ये भूमि आपको दे सकें। ऐसी स्थिति में हम लोगों का कर्तव्य था कि हम वहां जाते और ट्रस्ट बनाते। यहीं पर पुरी के शंकराचार्य की बात आ जाती है, कि जब प्रधानमंत्री ने ये घोषणा कि और बुलाया, तब उन्हें वहां जाना चाहिए था या नहीं। आप यह कहते हैं कि अाप इसलिए नहीं गए, क्योंकि वहां मसजिद बनने वाली है। मेरे कारण इस समय भगवान तंबू में बैठे हैं। अगर मैं दस्तखत करता, तो ऐसा न होता।


सवाल यह है, कि जब आपको बुलाया गया था, तो आपका फर्ज था कि आपको जाकर पूछना था, जो जगह हम मांग रहे हैं, वहां मस्जिद बनेगी या नहीं बनेगी। अगर वे कहते कि मस्जिद बनेगी, तो दस्तखत न करते। अाप गए ही क्यों नहीं। वो ये कहते हैं कि आज भगवान पॉलिथीन के नीचे हैं, वह मेरा दायित्व है। मैंने ऐसा कर दिया।

पॉलिथीन में भगवान तो आपने क्या किया

शंकराचार्य ने कहा कि सवाल यह है कि पॉलिथीन में भी अगर भगवान हैं, तो उसके लिए आपने क्या किया? कारसेवकों ने तो वह भी तोड़ दिया था। और सुन्नी बोर्ड तो यह भी कह रहा था, कि प्रतिमा को हटाया जाए। उसे बचाने के लिए आपने क्या किया? आप तो सीधे कह देते हैं, कि और शंकराचार्यों ने दस्तखत कर दिया, मैंने नहीं किया। आपने ये कभी पूछा कि हमने क्यों दस्तखत कर दिया। शृंगेरी के शंकराचार्य जी, हम और रामानंद संप्रदाय के रामनरेशाचार्य जी नरसिम्हा राव के यहां गए। उनसे पूछा कि जहां रामजन्म भूमि है, वहां मस्जिद तो नहीं बनेगी, उन्होंने कहा नहीं बनेगी, तब हमने दस्तखत किया। उल्टा हम लोगों को अपराधी बनाया जा रहा है।”

क्या कहा था शंकराचार्य निश्चलानंद सरस्वती ने
कवर्धा के मड़मड़ा में 29 जनवरी को विचारगोष्ठी में पुरी के शंकराचार्य निश्चलानंद सरस्वती ने कहा था कि नरसिम्हा राव और अटलबिहारी बाजपेयी ने प्रधानमंत्री पद पर रहते अयोध्या में मंदिर व मस्जिद दोनों बनाने के लिए मुझसे सहमति पत्र पर हस्ताक्षर करने का निवेदन किया था। मेरे अलावा तो सभी शंकराचार्यों व वैष्णवाचार्यों ने हस्ताक्षर कर दिए थे। लेकिन मैंने मना कर दिया। इस वजह से रामलला आज भी तंबू में हैं।

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