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भोरमदेव में बसेंगे बाघ, टाइगर रिजर्व एरिया से 11 गांव शिफ्ट किए जाएंगे

भोरमदेव को टाइगर रिजर्व फाॅरेस्ट का आकार देने की प्रक्रिया शुरू हो गई। इस रिजर्व फारेस्ट के दायरे में 39 गांव आ रहे हैं

Danik Bhaskar | Feb 03, 2018, 07:19 AM IST

रायपुर. भोरमदेव को टाइगर रिजर्व फाॅरेस्ट का आकार देने की प्रक्रिया शुरू हो गई। इस रिजर्व फारेस्ट के दायरे में 39 गांव आ रहे हैं। इनमें से 11 गांव कोर एरिया में हैं। इन्हें शिफ्ट करने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। गांव वालों की सभाएं लेकर उन्हें दूसरी जगह बसने का विकल्प सुझाया जा रहा है। एक-दो महीने के भीतर शिफ्टिंग के दूसरे चरण का काम चालू हो जाएगा।
भोरम देव के 187 वर्ग किमी के दायरे को पहले अभयारण्य क्षेत्र में सम्मिलित किया गया था। अब इसका पुर्नगठन कर दायरा बढ़ा दिया गया है। भोरम देव के प्रस्तावित टाइगर रिजर्व का क्षेत्र 351 वर्ग किलोमीटर हो चुका है। इस संबंध में अधिसूचना भी जारी कर दी गई है।

- यहीं के 11 गांव ऐसे इलाके में आ रहे हैं जो पूरी तरह से बाघों के रहवास और उनकी संख्या वृद्धि के लिए उपयुक्त है। इसी वजह से इन गांवों को चिन्हित कर जंगल के कोर एरिया से बाहर किया जाने का प्रस्ताव है। वन विभाग के अफसर ग्रामीणों को विकल्प सुझाने फील्ड में उतर चुके हैं। उनसे सहमति लेकर शासन के समक्ष प्रस्ताव भेजा जाएगा।


- उसके बाद ग्रामीणों को मकान दिए जाएंगे। इसके अलावा नई जगह पर खेत देने की प्लानिंग है। वन विभाग की ओर से इसके लिए जगह का चयन भी कर लिया गया है।

क्यों है भोरमदेव खास
- कबीरधाम जिले में आने वाला भोरमदेव कई मायनों में खास है। अभयारण्य की सीमा में भोरमदेव मंदिर है। प्राचीन मंदिर 11वीं शताब्दी में नागवंशी राजा गोपाल देव ने बनवाया था। मंदिर प्राचीन होने के कारण छत्तीसगढ़ के खजुराहो के नाम से प्रसिद्ध है।

इसलिए कान्हा के बाघ आ रहे हैं यहां
- कान्हा किसली के जंगलों में बाघों की संख्या ज्यादा हो गई है। वहां जनसंख्या लगातार बढ़ती ही जा रही है। इस बीच पर्यटकों का फ्लो बेहद बढ़ गया है। वन विभाग के विशेषज्ञों के अनुसार बाघों को वहां से ज्यादा बेहतर और सुरक्षित वातावरण यहां भोरमदेव में मिल रहा है। यहां हिरण और चीतल जैसे जानवर बड़ी संख्या में है। इसी वजह से यहां बाघ आ रहे हैं।

बाघों के रहवास के लिए बेहतर
- सीसीएफ वाइल्ड लाइफ ओपी यादव का कहना है बाघों के रहवास के लिए ये बेहतर जगह है। बाघों ने इस संरक्षित इलाके को कॉरीडोर बनाया है। इस वजह से उन्हें यहां रहने में किसी तरह की दिक्कत नहीं होगी।

भाेरमदेव का चयन इसलिए

- भोरमदेव के एक हिस्से में मप्र के मंडला जिले की सीमा है। इसकी सीमा से मप्र का तरेगांव क्षेत्र सटा हुआ है। एक हिस्से में रानीदहरा की पश्चिमी सीमा है। इसके पश्चिम क्षेत्र में कान्हा किसली का कोर एरिया सटा हुआ है। कान्हा किसली के बाघ इसी सीमा से भोरम देव में एंट्री करते हैं और यहां से अचानकमार अभयारण्य जाते हैं। करीब चार-पांच साल से बाघाें का लगातार आना जाना हो रहा है।

- अचानकमार के जंगलों में कुछ दिन गुजारने के बाद बाघ वापस इसी रास्ते से कान्हा में एंट्री कर जाते हैं। बाघों की लगातार और बेरोटोक एंट्री के कारण ही भोरमदेव को टाइगर रिजर्व बनाने का प्रस्ताव नेशनल टाइगर कंटजर्वेटर अथॉरिटी को भेजा गया था। वहां से टीम सर्वे करने आई थी। पूरे कॉरीडोर का सर्वे करने के बाद ही इसे मंजूरी दी गई है।