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एक ने किडनी देकर भाई को बचाया, तो दूसरी ने बेटे के लिए साइकल से बेचा सामान

प्रदेश की दो महिलाएं अपने आप में एक मिसाल हैं। ये इत्तेफाक ही है क्योंकि दोनों महिलाओं का नाम सावित्री है।

Bhaskar News | Last Modified - Mar 08, 2018, 08:02 AM IST

  • एक ने किडनी देकर भाई को बचाया, तो दूसरी ने बेटे के लिए साइकल से बेचा सामान
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    दोनों महिलाओं का नाम सावित्रि है।

    रायपुर (छत्तीसगढ़).प्रदेश की दो महिलाएं अपने आप में एक मिसाल हैं। ये इत्तेफाक ही है क्योंकि दोनों महिलाओं का नाम सावित्री है। देवभोग की रहने वाली एक सावित्री ने मौत की कगार पर पहुंचे भाई को अपनी एक किडनी देकर जीवन दान दिलाया। वहीं अमलीपदर की सावित्री ने पति की मौत के बाद बच्चों की अच्छी परवरिश की खातिर पुरुषों के मुकाबले जी तोड़ मेहनत कर परिवार को संभाला। भाई को किडनी देकर बचाया...

    - देवभोग के राजापारा में रहने वाले छोटे से किसान राजाराम की 45 साल की पत्नी सावित्री सिन्हा के भाई की छह माह पहले तबियत बिगड़ी, उसका ओडिसा के साल्हेभाटा का रहने वाला बड़ा भाई श्यामलाल सिन्हा का विशाखापटनम के हाॅस्पिटल में जीवन और मौत के बीच झूल रहा रहा था।

    - सावित्रि को पता चला कि भाई की दोनों किडनी खराब हो गई हैं। तब सावित्री अपनी एक किडनी भाई को देने का फैसला कर विशाखापटनम पहुंच गई। सफल आॅपरेशन के बाद भाई पूरी तरह से ठीक हो गया। सावित्री भी आज खुशहाल है। कुछ समय पहले क्षेत्र के डडसेना समाज ने सावित्री के इस साहसिक पहल के लिए उसे सम्मानित भी किया है।
    - समाज के जिला पदाधिकारी मुरलीधर सिन्हा ने कहा कि सावित्री के दो बच्चे हैं, एक 8 साल और दूसरा 15 साल का है, सांसारिक मोह को त्याग कर हमारे समाज के इस सावित्री ने कलयुग में भी सावित्री के नाम को सार्थक कर दिया है।

    पेट पालना था मुश्किल, इसलिए किया कठोर परिश्रम

    - महिला होने के नाते कम मजदूरी मिल रही थी, दो बच्चों के साथ गुजारा भी मुश्किल होते देख, पुरुषों की तरह कड़ी मेहनत कर अमलीपदर की सावित्री नागेश ने परिवार को संभाला। पहले सायकल चलाना सीखा, फिर उसी सायकल से लंबी दूरी तय कर बांस के बर्तन बेचने हर हफ्ते साढे तीन सौ किलोमीटर से भी ज्यादा दूरी तय कर इलाके भर के साप्ताहिक बाजार में पहुंचती है।

    - 20 साल पहले कैंसर से पीड़ित पति की मौत के बाद सावित्री को दो जून की रोटी भी नसीब नहीं हो रही थीं। 8 सालों तक अथक संघर्ष करती रही। बुरे दौर में बड़े बेटे ने आत्महत्या कर ली थी। छोटे बेटे की खुशियों को संजोना था, ऐसे परिस्थितियों में सावित्री ने अबला की भांति किस्मत को कोसने के बजाए कड़ी मेहनत करने की ठानी।

    - भाई चिंता राम से सहयोग लेकर पुरानी सायकल का बंदोबस्त किया। 9 साल पहले सायकल चलाना सीखी, फिर अमलीपदर से 80 किमी दूर कुल्हाड़ीघाट के दुर्गम पहाड़ियों में कुम्हारों के बीच पहुंचकर बांस का बर्तन लाकर बाजार में बेचना शुरु किया, जो आज भी जारी है। परिवार की स्थिति भी सुधरी, टूटी -फूटी झोपड़ी के स्थान पर बना उसका पक्का मकान भी उसके अथक संघर्ष की कहानी बयां कर रहा है।

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    अमलीपदर की सावित्री ने पति की मौत के बाद बच्चों की अच्छी परवरिश की खातिर पुरुषों के मुकाबले जी तोड़ मेहनत कर परिवार को संभाला।
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    देवभोग की सावित्री ने मौत की कगार पर पहुंचे भाई को अपनी एक किडनी देकर जीवन दान दिलाया।
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Web Title: Two Women Two Motivational Story On Women Day
(News in Hindi from Dainik Bhaskar)

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