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मंदिर जाते हैं दर्शन करने पर वहां आंखें बंद कर लेते हैं लक्ष्मी की पूजा हम करते हैं, लेकिन वह चीन भाग रही है

लेखक देवदत्त पटनायक (बाएं) के साथ चर्चा करते दैनिक भास्कर के एडिटर छत्तीसगढ़ शिव दुबे। सिटी रिपोर्टर | रायपुर ...

Bhaskar News Network | Last Modified - Apr 01, 2018, 02:45 AM IST

मंदिर जाते हैं दर्शन करने पर वहां आंखें बंद कर लेते हैं लक्ष्मी की पूजा हम करते हैं, लेकिन वह चीन भाग रही है
लेखक देवदत्त पटनायक (बाएं) के साथ चर्चा करते दैनिक भास्कर के एडिटर छत्तीसगढ़ शिव दुबे।

सिटी रिपोर्टर | रायपुर

दैनिक भास्कर और प्रभा खेतान फाउंडेशन की कलम संवाद सीरीज में शनिवार को मशहूर मैथोलॉजिस्ट और राइटर देवदत्त पटनायक रायपुरियंस से रूबरू हुए। उन्होंने धर्म, आस्था, मानव जीवन के अर्थ पर विस्तार से चर्चा की। देवदत्त ने शास्त्र और बिजनेस के संदर्भ मेंे कहा कि हमें लक्ष्मी की बहुत आवश्यकता है। लेकिन हमें लक्ष्मी को लाना नहीं अाता। घर में लक्ष्मी को लाना मांगल्य लाना कहते हैं, लेकिन हम अपने घर में कलह ला रहे हैं। हमें लक्ष्मी का ज्ञान है। हमारे शास्त्र में भी लक्ष्मी का बहुत सुंदर उल्लेख है। अमेरिका और यूरोप में लक्ष्मी लाने के लिए पढ़ाई करते हैं। वहां के मॉडर्न बिजनेस में मार्केट कैप्चर, स्ट्रेटजी जैसे शब्द यूज होते हैं। स्ट्रेटजी को रणनीति से जोड़ा और रणनीति को बिजनेस से जोड़ दिया, तो इसमें से जो लक्ष्मी आएगी, वो कलह और झगड़े से ही लाएगी। हम मंदिर में जाते हैं और वहां आंखें बंद करते हैं। मंदिर जाएं तो आंखे खोलकर दर्शन करें। हमारे शास्त्र में दर्शन है, उसे पढ़ें और समझें। इसलिए तो लक्ष्मी भारत में नहीं आती, चीन की तरफ भाग जाती है। क्योंकि वहां दूसरा इंद्र मिल गया है। इसे ही बिजनेस का कंज्यूमर इनसाइड कहते हैं। सिंगापुर, ताइवान ये ऐसी कंट्रीज हैं, जिनके पास खुद की जमीन नहीं, लेकिन वहां लक्ष्मी आ रही है। लक्ष्मी भाग रही है, क्योंकि वो चंचल है। शास्त्रों की पूजा नहीं बल्कि उन्हें पढ़ें और समझें। कार्यक्रम के मॉडरेटर दैनिक भास्कर के एडिटर छत्तीसगढ़ शिव दुबे थे।

Kalam Series

दैनिक भास्कर कलम संवाद सीरीज की 25वीं कड़ी में शामिल हुए राइटर देवदत्त पटनायक प्रभा खेतान फाउंडेशन के कार्यक्रम के प्रस्तुतकर्ता श्री सीमेंट थे। काशी मेमोरियल सोसाइटी सहभागी थी

कार्यक्रम में धर्म, आस्था, मानव जीवन पर देवदत्त पटनायक के विचार को सुनने बड़ी संख्या में शहर के साहित्य प्रेमी मौजूद रहे।

दिल को छोड़ दिमाग से सोचें आस्था से विचार की ओर जाएं

देवदत्त पट्टनायक ने कहा कि जहां जीवन होता है, वहां संकट होता है। आस्था में यहीं लोग चाहते हैं कि वो कार्यकर्ता बने रहें, कर्ता ना बने। ये राजनीति का सच है कि गद्दी छोड़ना कोई नहीं चाहता। भीष्म पितामह भी गद्दी नहीं छोड़ रहे थे, तब श्रीकृष्ण ने तीर से उन्हें बांधकर रखा। कार्यकर्ताओं को आने दीजिए, गलती करेंगे, लेकिन सीखेंगे भी। आस्था का संबंध दिल से होता है। हमारे देश में काफी बुद्धिजीवी हैं, हमारे देश में काफी ज्ञान है। इसलिए देश के लोग दिल को छोड़कर दिमाग की तरफ जाएं। अब उल्टी गंगा बहनी चाहिए। आस्था से विचार की तरफ जाएं। इस मौके पर देवदत्त ने बताया कि उन्हें बचपन से ही पौराणिक कथाओं से लगाव रहा। बचपन से ही स्कूली किताबों को पढ़ने के अलावा वे वेदों को भी पढ़ते थे। क्योंकि शास्त्रों में काफी ज्ञान है। मेडिकल फील्ड से होने के बावजूद इस ओर देवदत्त का रुझान कभी कम नहीं हुआ। समय के साथ उन्होंने पौराणिक कहानियों, संस्कारों और रीति रिवाजों पर लिखना शुरू किया। लेखक देवदत्त पटनायक की अब तक 30 से भी ज्यादा किताब और 600 से भी ज्यादा स्तंभ प्रकाशित हो चुके हैं।

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Web Title: मंदिर जाते हैं दर्शन करने पर वहां आंखें बंद कर लेते हैं लक्ष्मी की पूजा हम करते हैं, लेकिन वह चीन भाग रही है
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