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तेरे गम में मुझको जीना अच्छा लगता है तन्हा रहकर दर्द को पीना अच्छा लगता है...

रायपुर | राज्य युवा आयोग ने छत्तीसगढ़ हाट में ‘रंग-ओ-अदब’ कार्यक्रम रखा। यहां ओपन माइक, नाट्य मंचन और मुशायरे में...

Bhaskar News Network | Last Modified - Apr 01, 2018, 02:45 AM IST

तेरे गम में मुझको जीना अच्छा लगता है तन्हा रहकर दर्द को पीना अच्छा लगता है...
रायपुर | राज्य युवा आयोग ने छत्तीसगढ़ हाट में ‘रंग-ओ-अदब’ कार्यक्रम रखा। यहां ओपन माइक, नाट्य मंचन और मुशायरे में साहित्य, नाट्य प्रतिभा देखने को मिली। मुशायरे में शायर आलोक श्रीवास्तव ने सुनाया- ‘ये सोचना गलत है कि तुम पर नजर नहीं, मशरूफ हम बहुत हैं मगर बेखबर नहीं, अब तो खुद अपने खून ने भी साफ कह दिया, मैं आपका रहूंगा पर उम्रभर नहीं...’, डॉ. नुसरत मेहदी ने ‘आजिज़ी आज है मुमकिन, है न हो कल मुझ में, इस तरह ऐब निकालो न मुसलसल मुझ में... सुनाकर तालियां बंटोरी। आशीष सिंघानिया ने सुनाया- ‘तेरे गम में मुझको जीना अच्छा लगता है, तन्हा रहकर दर्द को पीना अच्छा लगता है...’ तेरे साथ की जाने कितनी यादें कायम हैं, इसलिए तो सावन का महीना अच्छा लगता है...’। अजय अटपटू, नेहा दुबे ने भी अपनी कविताएं पेश कीं।

प्ले में सिपाही का दर्द, वजूद की जंग

कार्यक्रम में दो नाटकों का मंचन किया गया। पहला नाटक ‘भटकते सिपाही’ में एक सिपाही के दर्द और युद्ध के बाद उसके मानसिक युद्ध को दिखाया गया। इसके बाद नाटक ‘अंतर्द्वंद्व’ में कलाकारों ने कविताओं के जरिए स्त्री और पुरुष के बीच वजूद की लड़ाई काे दिखाया। ओपन माइक प्रोग्राम में सिटी के युवाओं ने अपने बातों से सामाजिक बुराइयों पर तंज कसा। यहां मंत्री बृजमोहन अग्रवाल, आरडीए अध्यक्ष संजय श्रीवास्तव, अमरजीत सिंह छाबड़ा, राज्य उर्दू अकादमी के उपाध्यक्ष नजमा अजीम खान सहित अन्य मौजूद थे।

सात साल इंतजार के बाद जगजीत सिंह ने कॉल कर कहा- शो में तुम्हारी गजल गाने वाला हूं, सुनने आ जाना

सिटी भास्कर से बातचीत में राइटर और गीतकार ओलाक श्रीवास्तव ने बताया- 1990 में सिंगर जगजीत सिंह को अपने गजलें सुनाने मैं उनके स्टूडियो पहुंचा। जानकारी मिली कि वे बाहर गए हैं, दो दिन बाद आएंगे। लेकिन जगजीत जी वहीं थे। मैंने तीन िदन लगातार उनका इंतजार किया। आखिरकार जगजीत जी को बताया गया कि कोई व्यक्ति आपसे मिलने के लिए तीन दिन से इंतजार कर रहा है। उनसे मिलते ही मैंने उन्हें अपने लिखे गीत सुनाए और अपनी आवाज देने की ख्वाहिश जाहिर की। उस समय उन्होंने गाने से मना कर दिया, लेकिन सात साल बाद 1997 में उन्होंने मुझे कॉल कर बताया- एक शो में मैं तुम्हारी गजल गा रहा हूं, सुनने आ जाना। जब मैं शो में पहुंचा तो आखिरी सीट में बैठकर अपनी लिखी गजल ‘मंजिलें क्या हैं, रास्ता क्या है, हौसला हो तो फासला क्या है...’ को जगजीत सिंह जैसे महान फनकार की आवाज में सुनना मेरे लिए किसी सपने के सच होने जैसा था। आलोक श्रीवास्तव के गीतों को जगजीत सिंह के अलावा पंकज उधास, तलत अजीज, शुभा मुद्‌गल, अमिताभ बच्चन जैसे कलाकारों ने अपनी आवाज दी है। आलोक प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में काम कर चुके हैं। उन्हें दुष्यंत सम्मान, फिराक गोरखपुरी सम्मान, हेमंत स्मृति कविता सम्मान, यूके सम्मान जैसे कई अवॉर्ड से नवाजा जा चुका है। अालोक इन दिनों पंकज उधास के साथ एक एलबम में काम कर रहे हैं।

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