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रंग-गुलाल में मिलावट जांचने 3 विभाग, 17 साल में एक भी जांच नहीं, हर साल होली के बाद 20% लोगों को त्वचा रोग

रायपुर

Bhaskar News Network | Last Modified - Mar 02, 2018, 03:15 AM IST

रंग-गुलाल में मिलावट जांचने 3 विभाग, 17 साल में एक भी जांच नहीं, हर साल होली के बाद 20% लोगों को त्वचा रोग
रायपुर डीबी स्टार

डीबी स्टार टीम की पड़ताल में खुलासा हुआ है कि मिलावट रंगों की जांच करने के लिए खाद्य विभाग के पास कोई भी प्लान नहीं है। यहां तक कि नगर निगम भी खाद्य विभाग के ऊपर जिम्मेदारी डालकर बच रहा है। वहीं जिला प्रशासन भी मिलावटी रंग बिकने की खबर से अनजान है। यानि तीनों विभागों ने जांच और कार्रवाई के लिए अधिकार नहीं होने का दावा करके बचने का प्रयास कर रहे है, जबकि मार्केट में धड़ल्ले से मिलावटी वाले रंग बिक रहे है। उन रंगों की पहचान कोई भी नहीं कर पाता। इसका साइड इफेक्ट त्यौहार बीतने के बाद पता चलता है। इसी तरह से हर साल सरकारी अस्पतालों में 100 में से 20 व्यक्ति त्वचा संबंधी इलाज के लिए पहुंचते है।

DB Star

इन तीन विभागों को जांच करने की जिम्मेदारी

ऐसे बचें रंग-गुलाल से, क्योंकि ये सबसे ज्यादा घातक...

चमकीले रंगों से बचें, उसमें पिसा हुआ शीशा मिला रहता है। इससे एलर्जी होती है।

ब्लू कलर से बचकर रहें, क्योंकि इसमें लेड केमिकल का इस्तेमाल होता है। इससे लाल चकते होते है।

पीले रंग में क्रोमियम आयोडाइड मिला होता है। इससे एलर्जी और सांस की बीमारी होती है।

सिल्वर कलर में एल्युमिनियम ब्रोमाइड होता है, इससे स्कीन कैंसर की बीमारी होती है।

ब्लैक कलर में लेड होता है। इससे एलर्जी होता है और स्कीन को नुकसान पहुंचता है।

ग्रीन कलर में कॉपर सल्फेट होता है। इससे आंख की बीमारी और अधंता का कारण बनता है।

रेड कलर में मक्यूरिक ऑक्साइड होता है। इससे एलर्जी और स्कीन कैंसर होता है।

स्किन प्रॉब्लम लेकर आते है पेशेंट

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खाद्य विभाग

 हर साल स्कीन प्रॉब्लम की शिकायतें आती है। महिलाएं और पुरूष दोनों ही त्योहार के बाद पहुंचते है। मिलावट वाले रंग तुरंत इफेक्ट कर देते है। ऐसा नहीं है कि उसके लिए कोई टाइम लगता है। ऐसी परेशानियां भी तुरंत ठीक नहीं होती। इसके लिए समय लग जाते है। प्रमोद निगम, स्कीन स्पेशलिस्ट, आंबेडकर अस्पताल

जिला प्रशासन

नगर निगम

निगम व जिला प्रशासन करें जांच

 मिलावटी रंग की जांच करने का अधिकार हमें नहीं है। निगम या फिर जिला प्रशासन ही कार्रवाई करता है। हम सिर्फ खाद्य पदार्थ एवं दवाओं की ही जांच करते है। रंग जांचने मशीन भी नहीं है। डॉ. अश्वनी देवांगन, असिस्टेंट कमिश्नर, खाद्य एवं औषधि विभाग

झूठ बोल रहे खाद्य विभाग वाले

 नगर निगम के पास मिलावटी रंग जांचने का अधिकार नहीं है। इसका पावर काफी पहले ही ले लिया गया है। खाद्य विभाग वाले झूठ बोल रहे हैं। मिलावटी रंग जांचने की मशीन भी उन्हीं के पास है। विजय पांडे, स्वास्थ्य अधिकारी, ननि

ऐसे समझिए कैसे की जाती है रंगों में मिलावट और कितने प्रतिशत बढ़ जाते हैं त्वचा संबंधी रोगी

ऐसे बनता है मिलावटी रंग : वारनिस पेंट में और डिफरेंट टाइप्स कैमिकल रंगों में मिक्स किया जाता है। इसमें रेत, मिट्‌टी मिलाया जा रहा है। वहीं गुलाल में मैदा, सेलकड़ी मिलाया जा रहा है। रंग के गीले पाउच भी बाजार में बिक रहे है। पाउच में तेजाबी पानी और रंग का मिश्रण होता है। साथ ही गुलाल बनाने के लिए डीजल,इंजन ऑयल और कॉपर सल्फेट का इस्तेमाल करते है। सूखे गुलाल में एस्बेस्टस और सिलिका मिलाई जाती है। चमकीले गुलाल में एल्युमिनियम ब्रोमाइड भी मिलाया जाता है।

...और इस तरह की होती है बीमारी : रंग में एल्युमिनियम ब्रोमाइड से कैंसर का खतरा बढ़ जाता है। वहीं लाल गुलाल में मरकरी सल्फाइड त्वचा कैंसर को बढ़ावा देता है। इसी तरह नीला गुलाल प्रूशियन ब्लू होता है, जो त्वचा पर एलर्जी और संक्रमण पैदा करता है। गर्भवती महिलाओं के लिए एेसे रंग सबसे घातक होते है। कुछ रंगों में गंध होने पर उसे किसी के शरीर में लगाने से बचना चाहिए। वरना वह गंध वाले रंग त्वचा को हानि पहुंचा सकते है।

20% लोग त्यौहार के बाद आते है अस्पताल : अंबेडकर अस्पताल के त्वचा रोग डिपार्टमेंट की रिपोर्ट बतातीं है कि होली त्यौहार के दूसरे दिन से ही त्वचा रोगी पहुंचते है। 100 में से 20 लोगों के त्वचा में एलर्जी होने की शिकायत होती है। इनमें पुरुषों की संख्या ज्यादा पाई गई है। ज्यादातर पुरूष रंग अधिक समय तक खेलते है। धूप में भी ऐसे रंग सूखने के बाद ही इफैक्ट शुरु होता है।

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Web Title: रंग-गुलाल में मिलावट जांचने 3 विभाग, 17 साल में एक भी जांच नहीं, हर साल होली के बाद 20% लोगों को त्वचा रोग
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