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होली पर निकलती थी 100 लोगों की टोली, युवा करते थे डंडा डांस, बदल जाता था तालाब का रंग

गुझिया की सौंधी महक और ठंडाई की ठंडक के बीच अबीर-गुलाल की होली खेलने का मजा कुछ और ही है। रंगों के त्योहार के...

Bhaskar News Network | Last Modified - Mar 02, 2018, 03:15 AM IST

होली पर निकलती थी 100 लोगों की टोली, युवा करते थे डंडा डांस, बदल जाता था तालाब का रंग
गुझिया की सौंधी महक और ठंडाई की ठंडक के बीच अबीर-गुलाल की होली खेलने का मजा कुछ और ही है। रंगों के त्योहार के सेलिब्रेशन का तरीका नए दौर में भले ही बदल रहा हो, लेकिन आज भी जब टोलियां ढोल बजाकर गीत गाते हुए आगे बढ़ती हैं तो लोग घरों से निकलकर झूमने लगते हैं। आज भी शहर में होलिका दहन और होली खेलने के पुराने तरीकों को याद किया जाता है। होली पर सिटी भास्कर टीम ने सदर बाजार के शांति भाई माणिक, इतिहासविद् डाॅ. राम कुमार बेहार, दूधाधारी मठ के महंत राजेश्री राम सुंदर दास और महामाया मंदिर के पुजारी पंड़ित मनोज कुमार शुक्ल से की खास बातचीत। इस रिपोर्ट में जानिए कि सालों पहले शहर में कैसे मनाई जाती थी होली।

बूढ़ातालाब में लगता था हुजूम

60 साल पहले होली खेलने का अंदाज कुछ और ही था। लोग दिनभर रंग-गुलाल खेलते और शाम होते ही बूढ़ा तालाब और महाराजबंध तालाब में नहाने पहुंच जाते। उस दौर में पानी के दो बड़े स्रोत थे, जो शहर के बीचों-बीच थे। कुछ ही युवा खारुन नदी जाते थे। इन दोनों तालाब में बने घाट पर शाम होते ही सैकड़ों बच्चे, युवा और पुरुष नजर आते।

सदर बाजार में रात में होती थी नौटंकी

सदर बाजार की होली आज भी शहर में सबसे फेमस है। लगभग 60 साल पहले यहां और रंग जमता था। ये कहना हैं 79 साल के शांति भाई माणिक का। नाहटा मार्केट के पास स्टेज सजता और होलिका दहन वाले दिन नौटंकी होती थी। सारे कारोबारी और आसपास के मोहल्ले वाले आते और नौटंकी देखते। फिर होलिका दहन करते। सभी एक-दूसरे को रंग लगाते और मिठाई खिलाते।

जड़ी-बूटी पीसकर खेलते थे होली, कायम है परंपरा

लगभग 16वीं सदी में बने दूधाधारी मठ में गुलाबजल और जड़ी-बूटी से बने रंगों से होली खेली जाती थी। आज भी शगुन के तौर पर ऐसा किया जाता है। महंत राजेश्री राम सुंदर दास के अनुसार मठ में होली के लिए जड़ी-बूटी से गुलाल तैयार किया जाता है। होली वाले दिन मंदिर में भगवान को पहले इन्हीं गुलाल से अभिषेक किया जाता है, फिर मंदिर में ढोल नगाड़े बजाकर फाग गीत गाए जाते हैं।

सालों पुरानी अखंड ज्योति से होता है होलिका दहन

महामाया मंदिर में जल रही अखंड ज्योति से अग्नि का कुछ अंश लेकर मंदिर परिसर में होलिका दहन करने की परंपरा 100 साल से भी ज्यादा पुरानी है। जैसे ही मंदिर में होलिका दहन होता है, उसके बाद आसपास के मोहल्ले वाले उस होलिका दहन से अग्नि का कुछ अंश लेकर अपने मोहल्ले में जाकर होलिका दहन करते हैं। इसके साथ ही नरसिंह भगवान और प्रहलाद की पूजा की जाती है और सत्य के जयकारे लगाए जाते हैं। ये आज भी होता है।

टोली में होते थे 100 लोग जो मिलता हो जाता रंगीन

मौदहापारा स्थित दुर्गा कॉलेज में 1963 से 66 के किस्से शेयर करते हुए डाॅ. राम कुमार बेहार ने बताया, जहां विवेकानंद कॉलेज है, वो कभी दुर्गा कॉलेज का हाॅस्टल हुआ करता था। होली वाले दिन हॉस्टल के लड़के कॉलेज कैंपस में जमा हो जाते। इस तरह से लगभग 100 से भी ज्यादा स्टूडेंट्स कैंपस में जमा होकर हाथों में गुलाल लेकर पैदल चल पड़ते। कॉलेज के सभी प्रोफेसर के घर जाकर गुलाल लगाते और फिर शहर में घूम कर होली खेलते।

युवाओं की टोली रंगों से नहीं डंडा नृत्य कर मनाती थी होली

बस्तर में रंगों से नहीं, बल्कि डंडा नृत्य के जरिए होली मनाई जाती है। फाफाडीह निवासी 80 साल के श्याम प्रताप शर्मा ने बताया, बचपन में हमने देखा कि बस्तर के कुछ आदिवासियों की टोली होली के कुछ दिन पहले से रंग पंचमी तक शहर में रहकर डंडा नृत्य करती थी। खास फागुन मास में होने वाले इस डंडा नृत्य में फाग गीतों की तान छेड़ते हुए युवाओं की टोली नाचती। उसे सैला नृत्य भी कहते थे, इसमें शामिल पुरुष कलात्मक तरीके से तैयार होते और नृत्य करते। आसपास के लोग उनका नृत्य देखते और उन्हें फिर चावल, साग या कुछ पैसे देते थे।

और अब नए कपड़ों में खेली जाती है होली

पिछले सालों तक होली पर हर घर में पुराने कपड़े पहनकर रंग खेले जाते थे। लेकिन अब यंगस्टर्स के बीच होली स्पेशल ड्रेस पहनकर खेलने का ट्रेंड है। इस बार मार्केट में होली है... बुरा न मानो होली है... बलम पिचकारी... गब्बर के डॉयलॉग होली कब है... जैसे स्टेटस प्रिंटेड टीशर्ट काफी डिमांड में रही। इनके साथ ही फनी गॉगल्स, मूंछ, ईयररिंग, टोपी और मास्क जैसी एसेसरीज भी अब हजारों लोग इस्तेमाल करने लगे हैं।

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