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जब दूसरों में बुराई देखना बंद कर दें तभी बन सकते हैं वैरागी: मैथिलीशरण

कम्युनिटी रिपोर्टर | रायपुर वैराग्य तभी परिपूर्ण माना जायेगा जब वैरागी को दूसरों में दोष न दिखाई देता हो। यदि...

Danik Bhaskar

Mar 01, 2018, 03:25 AM IST
कम्युनिटी रिपोर्टर | रायपुर

वैराग्य तभी परिपूर्ण माना जायेगा जब वैरागी को दूसरों में दोष न दिखाई देता हो। यदि वैरागी को दूसरों में दोष दिखाई दे रहा है तो इसका मतलब है कि उसका वैराग्य अभी पूरा नहीं हुआ। उसमें आसक्ति अब भी बनी हुई है। वैराग्य तभी पूरा होता है जब इसे योग से निष्कामता की अग्नि से उसे तपाया जाता है।

यह विचार बुधवार को महामाया मंदिर में चल रहे श्रीरामकिंकर प्रवचन माला में मैथिलीशरण भाई ने रखे। उन्होंने आगे कहा कि अग्नि से निकले मक्खन से ज्ञान रूपी दीपक को जलाया जाए तो अंत:करण का ज्ञान प्रज्जवलित हो जाता है, फिर व्यक्ति में वैराग्य का दोष नहीं दिखता। अगर सिर्फ मक्खन को रोटी पर लगाकर खा लिया तो उससे ज्ञान दीपक नहीं जलेगा।



उल्टे की गई साधना भी बेकार हो जाएगी। उन्होंने आगे कहा कि गुरू भगवान से बड़े होते हैं। वास्तव में सच्चे गुरू और संत वही हैं जो वैराग्य से पूरी तरह से परिपूर्ण हैं। और वे प्रत्येक व्यक्ति में ईश्वर के दर्शन करते हैं। गुरू कितना बड़ा और महान है, ये बातें उनके शिष्य बताते हैं।

शिष्य कितने परिपूर्ण हैं, ये गुरू बताते हैं। सच्चे गुरू वे होते हैं जो अपने शिष्यों की इच्छा पूरी करने के लिये हमेशा अपना कर्तव्य करते हैं। क्योंकि, उनके पीछे भगवान खड़े होते हैं। गुरु के दिए वचन को सत्य करने की जवाबदारी भगवान की हो जाती है। गुरू को कभी भी अपने वैराग्य का या स्वयं को भगवान के समकक्ष नहीं बताना चाहिए। ऐसे में गुरुतत्व नहीं रह जाता। वे कितने भी ज्ञानी हों, लेकिन उन्हें अपने शिष्यों के सामने छोटा ही बने रहना चाहिए। इसी प्रकार से शिष्य भी चाहे कितने भी योग्य क्यों न हों, गुरू के सामने हमेशा छोटा बनकर ही रहें।

राम का चरित्र और मनुष्य का स्वभाव

रामचरित मानस के शाब्दिक अर्थ की व्याख्या करते हुए उन्होंने श्रोताओं को बताया कि रामचरित मानस का अर्थ राम के चरित्र और मनुष्य के स्वभाव से है। भगवान राम ने अपने चरित्र से राम राज्य की स्थापना की। मनुष्य का स्वभाव है, वह जानता है कि राम राज्य न बना है, न बन सकता है और न बनेगा। मनुष्य अपना स्वभाव बदल नहीं सकता, चाहे वह कितना ही जतन क्यों न कर ले। राम राज्य तभी आएगा जब प्रजा भी अपने राजा के अनुकूल सम दृष्टि वाली हो जाए।

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