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लाखों के पैकेज और विदेश की नौकरी छोड़ अब नक्सल क्षेत्र में करते हैं ये Jobs

7 वर्ष पहले
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रायपुर. आपने ये तो सुना होगा कि आज के दौर में युवा अपना करियर बनाने के लिए दिन-रात एक कर रहे हैं और लाखों रुपए खर्च कर अच्छी से अच्छी एजुकेशन ले रहे हैं। वे अपना बेहतर भविष्य बनाने के लिए विदेशों में जाकर पढ़ना और नौकरी करना पसन्द करते हैं ताकि वे एक बेहतर जिंदगी जी सकें, यदि आप ऐसा सोच रहे हैं तो आप गलत साबित हो सकते हैं क्योंकि हम आपको बता दें कि आज भी ऐसे कई नौजवान हैं जो अपना बना बनाया करियर छोड़कर नक्सगढ़ में बच्चों को पढ़ाने का काम कर रहे हैं।
उन्हें विदेश में नौकरी के लिए कई ऑफर मिले लेकिन वे नहीं गए। लाखों का पैकेज छोड़कर महज 10-10 हजार में काम कर रहे हैं वो भी नक्सली दहशत के बीच। उनका बस यही एक उद्देश्य है कि वे नक्सल प्रभावित बच्चों को जागरूक बनाएं और एक अच्छा भविष्य दें। दिल्ली, उड़ीसा, आंध्रप्रदेश महाराष्ट्र, गुजरात, प. बंगाल, यूपी के इन युवाओं को जब सर्व शिक्षा अभियान के इस प्रोजेक्ट की जानकारी नेट पर मिली तो वे चले आए दंतेवाड़ा।
कांट्रेक्ट बेसिस पर करते हैं काम
एक साल के कांट्रेक्ट पर हैं, अब यहां रुकने का मन बना रहे हैं। पोटा केबिनों में पढ़ने वाले बच्चों और 23 ग्राम पंचायतों में शिक्षा का काम संभालने वाले युवाओं का यहां के लोगों से लगाव हो गया हो गया है। इनमें से एक आशीष श्रीवास्तव कहते हैं कि सभी लोग शहरों में काम करना चाहते हैं। दंतेवाड़ा कौन जाता। मन में इच्छा थी कि समाज ने इतना कुछ दिया तो अब उसे लौटाने का वक्त आ गया है। क्रूनल देसाई बताते हैं कि दंतेवाड़ा की वेकेंसी के बारे में ई-मेल ग्रुप से जानकारी मिली। मैं शिक्षा के क्षेत्र में अलग तरह का काम करना चाहता था। यह आइडिया नया था। इसलिए यहां आया। मालूम हो कि पोटा केबिन सर्व शिक्षा अभियान के प्रोजेक्ट हैं। हर केबिन में 300 से 500 बच्चे रहते हैं। नक्सलियों द्वारा स्कूलों को जलाने या ढहाने के बाद शासन ने बच्चों की पढ़ाई जारी रखने यह योजना शुरू की है।
बच्चों को यह फायदा
देखरेख में मदद, पढ़ाई में गुणवत्ता, मजबूत शिक्षा नींव, शहरी शिक्षकों से पढ़ाई होने से आत्मविश्वास, पढ़ाई के नए तरीके, बाल पंचायतों में अपनी बातें रखना, अनुशासन व संस्कृति के टिप्स, खेल-खेती-कंप्यूटर-इलेक्ट्रिकल्स आदि की प्रैक्टिकल पढ़ाई, ग्रामीणों को भी मदद।

कौन कितना शिक्षित
आशीष श्रीवास्तव : लखनऊ के इंजीनियर हैं। बचपन बनाओ अभियान के डायरेक्टर हैं। 6 वर्षों तक इंफोसिस व एनआईआईटी गुड़गांव में आपरेशन इंचार्ज रह चुके हैं।
अयप्पा सीपी : बंगपाल पोटा केबिन में पढ़ाने वाले बैंगलुरु के अयप्पा सीपी का चयन यूएसए में पीएचडी व मास्टर इन बायोटेकेनालाजी करने हो चुका था लेकिन वे दंतेवाड़ा चले आए। मनिपाल विवि से बीटेक करने वाले अयप्पा बार्कलायस बैंक में काम कर चुके हैं।
दयानंद पाटिल : एक नामी कंपनी में 5 साल तक प्रोजेक्ट मैनेजर रहे पाटिल माइक्रोबायोलाजी में बीएससी हैं।

क्रूनल देसाई – सूरत के रहने वाले देसाई अजीम प्रेमजी विवि से एमए (शिक्षा) हैं। टाटा कंसलटेंसी सर्विसेस में आठ साल अफसर रहे हैं। उन्होंने गुजरात विवि से एमसीए भी किया है।
साधना साहू - कटक की साधना ने बीएससी व एमएससी बायोटेक्नालाजी में मिरांडा यूनिवर्सिटी से किया है। चार बार वे जेआरएफ व अन्य फैलोशिप के लिए चुनी जा चुकी हैं। बायोटेक्नालॉजी में पीएचडी करने।
प्रणीथ सिम्हा मुलामरेड्‌डी - कुरनूल के रहने वाले प्रणीथ इंडियन इंस्टीट्यूट आफ साइंस एंड एजुकेशन रिसर्च पुणे में रह चुके हैं। वे बचपन बनाओ के एक्जीक्यूटिव डायरेक्टर के रूप में शिक्षा और कृषि को लेकर काम कर रहे हैं।
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