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रूङ्घञ्ज॥ : यहां रात में आती हैं आवाजें, हमारे साथ ये सब न करो हाथ जोड़ते हैं हम

रूङ्घञ्ज॥ : यहां रात में आती हैं आवाजें, हमारे साथ ये सब न करो हाथ जोड़ते हैं हम

Brijesh Upadhyay| Last Modified - Dec 30, 2017, 03:05 PM IST

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चिरमिरी। सूरज के ढलते ही यहां के लोग साजापहाड़ स्थित बंद पड़े कोल माइंस की ओर गलती से भी नहीं जाते हैं। कोई यहां नया आता है तो उसे बताते हैं कि उधर नहीं जाना। कहते हैं वहां कोल माइंस को एक दीवार से चुन दिया गया है जिसके पीछे कई मजदूर जिंदा दफन हो गए थे। आज भी वहां से आवाज आती है। प्लीज हमारे साथ ऐसा मत करो, हमारे बच्चे और बीवी हमारा इंतजार कर रहे हैं। बचाओ... से आवाजें रात में भयानक तरीके से गूंजती हैं। जानिए पूरी घटना...

 

 


- लोगों का मानना है कि दशकों पहले यहां के कोयले की खान दुर्घटना हुई थी। एक पल्ली (शिफ्ट) के सारे मजदूर यहां दब गए थे, जिन्हें बाहर नहीं निकाला गया।
- और तो और खान का मुंह दीवार से बंद कर उन्हें उसी में चुन दिया गया।
- गांव वालों के मुताबिक, यहां काम करने वाले मजदूर गोरखपुर और पूर्वाचल के थे। ठेकेदार और मैनेजर के बीच किसी बात को लेकर झगड़ा हुआ था, जिसका खामियाजा यहां काम करने वाले मजदूरों को भुगतना पड़ा।
- एक खान दुर्घटना में यहां एक पल्ली के सारे मजदूर दब गए। ऐसा आरोप है कि दोनों के अनबन के कारण ब्लास्ट कर मजदूरों को दबा कर मार डाला गया।
- ग्रामीणों ने बताया कि कुछ मजदूरों का शव तो निकाला गया, लेकिन 30 से 35 मजदूर माइंस में ही फंस गए।
- माइंस की छत बैठने के बाद ठेकेदार द्वारा माइंस का दरवाजा भी बंद कर दिया गया। अब ग्रामीणों का कहना है कि उन्हें वहां हरपल ऐसा अनुभव होता है कि आज भी खदानों में काम कर रहें हैं।
- सांझ ढलते ही चरवाहे अपने पशुओं को लेकर घर चले आते हैं। कोई उधर जाता नहीं है। कहते हैं जो भी उधर रुका वो वापस आया और डर के चलते बीमार पड़ गया।
- कहते हैं कि रात में यहां कोयले को काटने की आवाजें आती हैं। रह-रहकर चीखें सुनाई देती हैं जिसमें मजदूर कहते हैं कि हमें बचा लो।
- हम नहीं रहे तो हमारे बच्चों अनाथ हो जाएंगे। भूखे मर जाएंगे। अरे बचा लो।
- यूपी के मिर्जापुर के रहने वाले है बुजुर्ग ग्रामीण ननकूराम ने बताया कि ये 1968 में यहां मालकट्टा का काम करते थे, एक गाड़ी भरने पर 9 रुपए मिलता था।
- मैनेजर सैगल साहेब और शहडोल के धोड़ी ठेकेदार कोयला निकलवाने का काम करते थे।
- आज बेरोजगारी के साथ-साथ इस डर से भी साजापहाड़ के लोग गांव छोड़कर पलायन कर रहे हैं।


अंग्रेजों के जमाने में शुरु हुआ था कोयला खनन


- वर्ष 1945 में साजापहाड़ में कोयला निकालने का काम अंग्रेजों ने शुरु कराया था। आजादी के बाद यहां 1960 से पहले कोल माइंस में दुर्घटना हुई।
- राष्ट्रीयकरण के बाद 1973 में इन माइंस को बंद कर दिया गया।

 

 

फोटो / वीडियो : अमित पांडेय 

 

 

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यहां थी कोयला की खदानें ।
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इस दीवार से बंद कर दिया गया था खदान का मुंह।
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यहां से आती हैं आवाजें।
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ये साजापहाड़ गांव जो हंटेड विलेज के तौर पर मशहूर हो रहा है।
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इन स्थानों से आती हैं आवाजें।
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आज भी यहां दिखती है कोयले की दीवारें।
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ये है वो हंटेड प्लेस।
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