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कभी भूल मत करना उसे इंसान समझने की करिश्मा है खुदा का वो जिसे तुम मां बुलाते हो

Dainik Bhaskar

Mar 17, 2019, 02:46 AM IST

Raipur News - जमाने के इरादों से कभी जब खौफ खाते हो, यकीनन दौड़कर तुम सब उसके पास जाते हो। कभी भूल मत करना उसे इंसान समझने की,...

Raipur News - chhattisgarh news do not forget to forget it is a miracle to understand the human being of god whom you call a mother
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जमाने के इरादों से कभी जब खौफ खाते हो, यकीनन दौड़कर तुम सब उसके पास जाते हो। कभी भूल मत करना उसे इंसान समझने की, करिश्मा है खुदा का वो जिसे तुम मां बुलाते हो...

शनिवार को मरीन ड्राइव स्थित नुक्कड़ कैफे में ऐसी ही चुनिंदा कविताएं और शायरियाें का दौर चला। मौका था दैनिक भास्कर, गोयल टीएमटी और डॉ. सीवी रमन यूनिवर्सिटी द्वारा होने वाले द ग्रेट इंडियन फिल्म एंड लिटरेचर फेस्टिवल यानी जिफलिफ के तहत आयोजित पोएट्री ऑन रूफटॉप के सेमीफाइनल राउंड का। शहर में 30 और 31 मार्च को होने वाले जिफलिफ से पहले रायपुरियंस को देशभर से सलेक्टेड 30 युवा कवियों की अलग-अलग टॉपिक पर हिंदी, उर्दू और अंग्रेजी में लिखीं कविताएं और शायरियां सुनने का मौका मिला। रायपुर सहित इंदौर, कोटा, भोपाल, नागपुर जैसे शहरों से चुने गए कवियों ने हिस्सा लिया। कॉन्टेस्ट में कारवां ग्रुप ने सहयोग किया। बेस्ट पोएट्स को जिफलिफ के स्टेज पर 30 मार्च को कविता सुनाने का मौका मिलेगा। इस मौके पर सतीश जायसवाल, जयंत दानिश छिब्बर सहित अन्य मौजूद रहे।

पोएट्री ऑन रूफटॉप में कविता पढ़तीं प्रतिभागी।

पढ़िए तीन चुनिंदा कविताएं और शायरियां

सुना है वो हर घड़ी हर पहर देखता है, खुदा जाने वो किधर-किधर देखता है। मंजिल तो खूबसूरत होगी ही मगर, सच्चा बशर तो सच्चा सफर देखता है। वो डूबते सूरज के साथ सबकुछ डूबा बैठा, कोई नई उम्मीद हर शहर देखता है। मीरा ने तो उस प्याले में भी अमृत देखा, कोई हरि के प्याले में भी जहर देखता है। उसकी नीयत की अफवाह पूरे शहर में है, जिसकी जैसी नजर वो वैसा देखता है। कभी कोई नापाक हरकत करना भी चाहूं अगर, आवाज़ आती है वो हर घड़ी हर पहर देखता है... अक्षय शर्मा, रायपुर

हम सुनाते गम हमारा शायरी में डालकर, बेच दे अपना अंधेरा रोशनी में डालकर। एक बोसा गाल पर देकर रवाना हो गए, क्यों परेशान कर रहे घी आग में डालकर। याद किसको कौन रखता आजकल के दौर में, भूल जाते हैं अस्थियों को एक नदी में डालकर। इस जनम में जो हमारा हो नहीं सकता कभी, वो खुद से मांगते हैं बंदगी में डालकर। तनुज धतिज , कोटा

वो मुझसे दूर जाती है, दिल कितना टूट जाता है। लहर को ताकता हूं तो, किनारा रूठ जाता है। कभी तिनका, कभी ज़र्रा, जुटाता हूं मोहब्बत का, वो झटके से आता है और सब कुछ लूट जाता है। खुदाई इश्क अपना था, खनक सिक्कों की कम हो जब, तो रिश्ता टूट जाता है। वो जब मिलते हैं कहते हैं, जां कुर्बान दूं तुझ पर, भरोसा चाहता हूं जब, भरोसा टूट जाता है। मैं भी झूठा, तू भी झूठी, हुकूमत भी है झूठों की, कोई सच बोलता है तो, ज़माना रूठ जाता है। जब सोचता है "शिव', कि अब कुछ बात हो उनसे, वो जब नजरें मिलाती हैं, पसीना छूट जाता है। शिवाजी राय "शिव' , भोपाल

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