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40% स्कूल बसों में फर्स्ट एड बॉक्स, 90% में बैग किट व 70% में स्पीड गवर्नर नहीं, 55% ड्राइवर व कंडक्टर भी दृष्टि दोष से पीड़ित

Bhaskar News Network

May 17, 2019, 07:40 AM IST

Raipur News - रायपुर

Raipur News - chhattisgarh news first ad box in 40 school buses bag kit in 90 and speed governor in 70 55 drivers and conductor also suffer from visual impairment
रायपुर
डीबी स्टार टीम ने स्कूल बसों की खामियों की पड़ताल की। इस दौरान खुलासा हुआ कि रायपुर में 900 बसें है। जिनमें 400 से ज्यादा बसें ऐसे है, जिनमें हर साल खामियां पाई गई, लेकिन उन खामियों को गिनाकर ही जिम्मेदारों ने छोड़ दिया। आरटीओ के नॉर्म्स में जिन नियमों का पालन स्कूल बसों को करना होता है, वह नहीं करते। यहीं वजह है कि जिन गाड़ियों को हर साल जांच के लिए बुलाया जाता है। उनमें हर बार खामियां मिलती है। वहीं सिर्फ एक बार जांच करने के बाद दोबारा जांच नहीं होती। यहीं वजह है कि कई बार बच्चों से भरी बस दुर्घटना का शिकार हो जाती है। ड्राइवर और कंडक्टरों का स्वास्थ्य परीक्षण किया जाता है। जिनमें से 55 फीसदी ऐसे ड्राइवर पाए गए हंै, जिन्हें निकट या दूर दृष्टि संबंधी बीमारी है।

लापरवाही

DB Star

राजधानी में स्कूल बसों की जांच में लापरवाही बरती जा रही है। जिन वाहनों की हर साल जांच हो रही, उन्हीं में से 50 फीसदी वाहनों में दोबारा वही खराबी मिली है। वहीं कार्रवाई के नाम पर सिर्फ जुर्माना ही वसूला गया। इसलिए सुधार नहीं हो रहा।

investigation

साल में सिर्फ एक बार ही जांच, वह भी सिर्फ खामियां गिनाने और सुधार के निर्देश तक सीमित

सीसीटीवी, गेट लॉकिंग सिस्टम व जालियां तक नहीं लगवा पाए


स्थिति : 40% बसों में नहीं, कुछ में है तो वो एक्सपायरी डेट के हैं जो नहीं बदले गए।

फिटनेस रद्द करने का नियम, फिर भी जुर्माना ही वसूल रहे

इधर, वाहनों में किसी भी तरह के बार-बार खामियां पाए जाने पर आरटीओ और ट्रैफिक को वाहन के फिटनेस रदद करने का नियम है, लेकिन दोनों ही कार्रवाई करने वाली एजेंसी जुर्माना ही लेकर छोड़ देती है। सिर्फ सुधार कार्य के लिए एक ही बार भेजा जाता है। दोबारा सुधार कार्य हुए या नहीं। इसकी कोई भी जानकारी नहीं दी जाती। न ही ट्रैफिक विभाग जानकारी मांगता है।


स्थिति : 90 फीसदी बसों में ऐसा कोई बॉक्स बनाया ही नहीं।


स्थिति : 75% में लॉक सिस्टम ही नहीं, मैनुअली काम।

खानापूर्ति


स्थिति : 40% बस में सिस्टम ही खराब।


स्थिति : सिर्फ 30%वाहनों में ही लगे।

दुर्घटना होने पर ही सक्रिय होते हैं जिम्मेदार शिक्षा विभाग को भी नहीं सौंपी जाती रिपोर्ट

स्वास्थ्य परीक्षण साल में एक बार, स्कूल कभी नहीं करवाते

दरअसल, सैकड़ों बच्चों की जिंदगी स्कूल बसों के ड्राइवर और कंडेक्टरों के हाथ में होती है, लेकिन स्कूल प्रबंधन इनका स्वास्थ्य परीक्षण नहीं करवाता है। क्योंकि साल में एक बार सिर्फ ट्रैफिक और आरटीओ परीक्षण करवाकर जांच करवा लेता है। फिर दोबारा कोई भी परीक्षण नहीं करवाता, जबकि हर साल ड्राइवर और कंडेक्टर के दूरदर्शी और निकटदर्शी की जांच होती है। जिनमें 50 फीसदी से ज्यादा ड्राइवराें में ऐसी तकलीफें देखने को मिलती हैं।

सीधीबात

इस बार सीधे फिटनेस ही रद्द करवाई जाएगी


नए शैक्षणिक सत्र के चालू होने से पहले करेंगे। थोड़ी गर्मी कम होगी फिर बुलवाएंगे।


हां, इस बार आरटीओ से भी अपील करूंगा कि ऐसे लोगों का फिटनेस ही रद्द किया जाए।


इस बार किसी को बख्शा नहीं जाएगा, सीधे कार्रवाई होगी।

एमआर मंडावी, एएसपी, ट्रैफिक

वेरिफिकेशन में नहीं मिले जरूरी दस्तावेज

पिछले कुछ सालों से बसों के अलावा दस्तावेजों की जांच करवाने के लिए बुलाया जाता है। इस दौरान सिर्फ गाड़ियों के वेरिफिकेशन किए जाते है और जरूरी दस्तावेजों की जांच भी खानापूर्ति के लिए की जाती है, जबकि हर साल दस्तावेज पूरे नहीं मिलते है। वहीं कुछ बसें ऐसी है, जो शहर में दौड़ रही है और उन्हें अनट्रेंड के हाथों में सौंप दिया गया है। इसी तरह 300 से ज्यादा वाहन चालकों की जांच में बीमारी से ग्रसित पाया गया।

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