स्टाफ की कमी बताकर दवा की जांच तो कर नहीं पा रहे सैंपल कैसे लेंगे अफसर

Bhaskar News Network

Jun 11, 2019, 07:40 AM IST

Raipur News - दवा की पर्याप्त सैंपल नहीं लेने वाले सहायक औषधि नियंत्रक (एडीसी) अब खाने की चीजों का सैंपल लेकर जांच के लिए...

Raipur News - chhattisgarh news how to find samples of the staff not able to check the medicine by telling the lack of staff
दवा की पर्याप्त सैंपल नहीं लेने वाले सहायक औषधि नियंत्रक (एडीसी) अब खाने की चीजों का सैंपल लेकर जांच के लिए भिजवाएंगे। ड्रग विभाग हमेशा स्टाफ का रोना रोता रहा है। अब फूड की दोहरी जिम्मेदारी मिलने से उनका काम प्रभावित होगा। विशेषज्ञों के अनुसार कौनसा कलर स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है, इसकी पूरी जानकारी फूड के अफसरों को होती है। एडीसी फार्मासिस्ट होने के नाते दवाओं की अच्छी जानकारी रखते हैं।

एडीसी को अविहित अधिकारी की अतिरिक्त जिम्मेदारी देने पर स्वास्थ्य विभाग सवालों के घेरे में आ गया है। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने अतिरिक्त जिम्मेदारी के लिए नियम में संशोधन किया था। इसके तहत एसडीएम को अविहित अधिकारी का जिम्मा देना था। अगर उन्हें यह जिम्मेदारी नहीं दी जाती तो सीएमएचओ को जिम्मेदारी दी जा सकती थी। हालांकि गजट नोटिफिकेशन में सीएमएचओ का कोई जिक्र नहीं है।



जिले के मुख्य स्वास्थ्य अधिकारी होने के नाते उन्हें अविहित अधिकारी का जिम्मा दिया जा सकता था। सीएमएचओ प्रदेश के सभी जिलों मंे पदस्थ है। जबकि एडीसी केवल 16 जिलों में है। बाकी 13 जिलों में एडीसी ही नहीं है, जिसके कारण मेडिकल स्टोर व अस्पतालों में स्थित मेडिकल स्टोर की जांच ही नहीं हो पा रही है। राजधानी में 500 से ज्यादा मेडिकल स्टोर है। इसकी जांच कभी-कभार की जाती है। जबकि लोगों को डॉक्टर के बिना प्रिस्क्रिप्शन के नशीली दवाएं मिल रही हैं। छोटे-छोटे क्लीनिक में बिना लाइसेंस के मेडिकल स्टोर रखे गए हैं। इसकी जांच कभी नहीं की जाती। नकली व सब स्टैंडर्ड दवा की शिकायत आम है, लेकिन ड्रग विभाग को प्रदेश में एक भी नकली दवा नहीं मिला है। जबकि विशेषज्ञों का कहना है कि पर्याप्त सैंपल नहीं लेने के कारण ऐसा हो रहा है। छत्तीसगढ़ के दूरदराज इलाकों में नकली दवा को आसानी से खपाया जा सकता है। दवा से जुड़े लोगों व डॉक्टरों का कहना है कि दवा की क्वालिटी पर आंख मूंदकर विश्वास नहीं किया जा सकता। दवा कंपनियां लैब टेस्ट की ओके रिपोर्ट तो देती है, लेकिन सरकारी लैब में जांच होने पर सैंपल फेल हो जाता है। ऐसे में कंपनी की लैब रिपोर्ट पर आंख मूंदकर विश्वास नहीं किया जा सकता।

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